Tag: #vinaychandouli

पर्यावरण

भेड़चाल

भेड़चाल.. सदियों से द्विविधा जनित भंवर में फंसता है मानव बार-बार, उठता कभी गगन छूनें को पकड नहीं पाता आकार। ...

पर्यावरण

पर्यावरण

मैं कोई दिवस नहीं? इस पृथ्वी के सम्पूर्ण जीवन का आवरण हूँ" मां की आंचल जैसा। पेडो़ से पूछो?? धूप ...

आग बोते हैं

आग बोते हैं

चलो आग बोते हैं.. पेड़ सारे काटकर कागज पे श्रद्धासुमन रख वातानुकूलित भवन की सब छाज छज्जा बंद कर अंतरजाल ...

अमानुष

नीरव

सब अकेले हैं धरा पर" दिखती बस भीड़ है अश्रु से सिंचिंत सदा भ्रम" द्रौपदी की चीर है।     ...

अमानुष

अमानुष

इस कालखंड में भीषण उठते ज्वर को देख रहा हूँ भूजल संग मानव के गिरते स्तर को देख रहा हूँ ...

पतन

चरैवेति

मैंने देखा स्वर्ग को मापते देवर्षियों को तपती दोपहरी में नंगे पांव उसी प्रकार चलते हुये जैसे अबोध बच्चा नग्न ...

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