जमीर मार बैठे हैं

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। मत जात पात की आग में झोंको मेरे देश को नेताजी पहनके खादी मत लजाओ बापू के भेष को तुम भूल गये कितनी दीं कुर्बानियां आजादी की खातिर माँ भारती के लिए हंसते-हंसते कट गये हजारों हजार सिर आज हम आजादी का इतिहास भुला बैठे हैं कुर्सी, पद, पैसा की खातिर जमीर मार बैठे हैं कोई धर्म – मजहब नहीं बुरा, सब अच्छे हैं बस इंसान ही इंसानियत से कच्चे हैं राजनैतिक मंचों से जहर उगला जाता है फिर जनता को आपस में लड़ाया जाता है वोट…