पुरोहित के मुक्तक

डॉ. राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। खुली किताब सी है मेरी जिन्दगीउन्मुक्त उड़ान सी है मेरी जिन्दगीयूँ ही गुजरती है देखो जिन्दगीकभी हँसी तो कभी गम में है जिन्दगी बेटियों को बचाने का जतन कीजिएजो कर रहे दरिन्दगी उनको सजा दीजिएवक़्त नहीं सोचने का रहा अभी दोस्तोंवक़्त रहते दोषियों को सजा दीजिए सादगी देख कर मेरी,वो कायल हो गए।समझो प्रेम में मेरे,वो घायल हो गए।।बात इतनी सी थी मगर, कैसे कहें दिल से।ढाई आखर प्यार में,वो पागल हो गए।। ढाई आखर में छिपा, जीवन का सब राज।जिस…