होमवर्क

अर्चना त्यागी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। स्टाफ रूम से डायरेक्टर साहेब के कमरे की और बढ़ते हुए दिनेश सर बस यही सोच रहे थे कि आज़ स्कूल का आखिरी दिन है। सभी टीचर उनके लिए दुआ कर रहे थे, लेकिन वो अपने मन को लगभग आश्वस्त कर चुके थे कि उनका स्कूल से निकलना अब तय है। अपना त्यागपत्र भी उन्होंने लिख कर जेब में डाल रखा था। प्रिंसिपल ने उन्हें अपने कमरे में बुलाने के बजाय डायरेक्टर के कमरे में ही जाने का संदेश भेजा था। दिनेश सर खुद…

दक्ष प्रजापति चालीसा

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। ब्रह्म कमल से ऊपजे,प्रजापति महाराज। चार वरण शोभित किया,करता नमन समाज।। जय जय दक्ष प्रजापति राजा। जग हित में करते तुम काजा।1 वेद यज्ञ के तुम रखवारे। कारज तुमने सबके सारे।।2 दया धरम का पाठ पढाया। जीवन जीनाआप सिखाया।3 प्र से प्रथम जा से जय माना। अति पावन है हमने जाना।4 पूनम गुरू असाड़ी आना। जा दिन को प्रगटे भगवाना।5 पीले पद पादुका सुहाये। देह रतन आभूषण पाये।।6 रंग गुलाबी जामा पाई। पीतांबर धोती मन भाई।।7 कनक मुकुट माथे पर सोहे। हीरा मोती…

छवि विमर्श

वाणी बरठाकुर  ‘विभा’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अम्बर पर है लाली छाई, खेतों में हरियाली आई । महकी महकी लगे हवाएं, शाखों पर कलियां मुस्काई।। अम्बर पर है लाली छाई….. लाल -लाल चूड़ी,चुनरिया, अधरों पर लाली का पहरा। लट कांधे पर आकर बिखरी, कानों में झुमकों का पहरा। धड़कन में मस्ती सी छाई  । शाखों पर कलियाँ मुस्काई… पांव लगे महावर से मीठे, गौरी मन ही मन मुस्काए । पैजन रुन झुन,रुन-झुन बोले, सुधियों में साजन मन भाए। प्रकृति ने हर दिशा सजाई । शाखों पर कलियां मुस्काई…. चमकीले मोती…

फार्म हाउस (लघुकथा)

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अय्याशी का अड्डा बन चुके सांसद साहब के फार्म हाउस में नित नये-नये कारनामे हो रहे थे, परंतु शहर के किसी समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल पर इस संबंध में कभी कोई खबर नहीं आई। फार्म हाउस में आधुनिक सब सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं। स्विमिंग पूल, डांस फ्लोर, जिम, ड्रिंक्स डिनर, अंग्रेजी स्लीपिंग रूम, लजीज खाना और इसके अलावा विदेशी कॉलगर्ल सहित देसी भारतीय युवतियों सहित तमाम सुविधाएं फार्म हाउस में उपलब्ध थीं । देर रात शहर के बड़े-बड़े आदमी सरकारी, अर्द्ध सरकारी, कुछ…

उम्र क्या है

अ कीर्ति वर्द्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। उम्र क्या है कुछ गिनतियों का खेल अथवा जिम्मेदारी का अहसास इस विवाद मे नही पडता अपितु प्रयास करता हूँ प्रत्येक उम्र में संतुष्ट रहने का जिससे बच जाता हूँ अनावश्यक तनाव से और रह पाता हूँ सदैव प्रसन्न। बडे होते बच्चों को सौंपकर जिम्मेदारी निर्णय लेने की मगर पलायन नही करता अपितु देता हूँ सलाह सहयोग जहाँ और जैसे अपेक्षित हो बच्चो को। उम्र कोई भी हो अच्छी होती है कुछ लेती है कुछ देती है। कभी बचपन छीनकर युवा बना देती…

इंसानियत

अर्चना त्यागी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कॉलेज से बाहर निकले तो आज फिर से हमारी बहस शुरू हो गई। शशांक का कहना था कि चलकर कुछ ठंडा पिया जाए लेकिन विवेक चाय पीने का शौकीन था। गर्मी बहुत थी और परीक्षाएं चल रही थी तो उनका बोझ भी सिर को गर्म कर रहा था। गर्मी को देखते हुए ठंडा पी लेना सही था, किंतु परीक्षाओं के तनाव को चाय कम कर सकती थी, कुछ देर के लिए ही सही। दोनों के झगड़े से बचने के लिए मैंने सुझाव दिया कि…

मेंढक-मेंढकी (बाल कहानी)

डाॅ. वाणी बरठाकुर ‘विभा’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। एक उपवन में तरह तरह के जीव रहते थे। वहीं पर एक जोड़ी मेंढक भी रहते थे।  कीड़े-मकोड़े पकड़ने के लिए हमेंशा उछल-कूद करते रहते थे। इस बात के लिए हर कोई उन दोनों को डांटता रहता था, लेकिन वे करें भी तो क्या करें,  उनको जीवित रहने के लिए खाना जरूरी है। बिना उछले वे एक खद्योत भी नहीं पकड़ पाते थे। एक दिन एक भौंरा फूलों पर मंडरा रहा था।  इतने में मेंढक की नज़र उस पर पड़ी तो बड़ी…

फ़ैसला

अर्चना त्यागी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। जतिन के पिता टीबी की लंबी बीमारी के बाद दुनिया से विदा हो गए। पीछे रह गए जतिन और उसकी मां। जतिन स्कूल में पढ़ रहा था और उसके मां बाप बीड़ी बनाने की फैक्ट्री में काम करते थे। वहीं से उसके पिता को बीड़ी पीने की लत लगी थी, जिसे वो टीबी के मरीज होने के बाद भी नहीं छोड़ पाए। यही कारण था कि इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो पाए। फैक्ट्री का मालिक पिता की जगह जतिन को काम पर…

कयामत

डाॅ. वाणी बरठाकुर ‘विभा’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कैसी कयामत ढाई हो। मौत यहां क्यो आई हो। घर-घर में आंसू देकर। कोरोना संग लाई हो।          कैसी कयामत….. वक्त वो फिर से आएगा। मौसम भी लाहलायेगा। है विश्वास हमें पूरा। देश मेरा मुस्कायेगा ।       तुम केवल परछाई हो।         कैसी कयामत……. कॉलेज सारे हैं खाली। बगिया में भी नही माली। चोपाये सब भूखे है। हँसना भूल गई डाली।      सुनी हुई शहनाई हो।          कैसी कयामत…… डर-डर…

सस्ती मजदूरी

अवधेश कुमार निषाद मझवार, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। रोज की भांति घनश्याम के हाथों में खाने का टिफिन नहीं था। सड़क सुनसान होने के साथ ही पूरे बाजार बंद थे। घनश्याम की पीठ में जोरदार लाठी पड़ती है, उसने पीछे मुडकर देखा तो वह लाठी पुलिस की लाठी थी। घनश्याम ने दोनों हाथ जोड़कर कहा-मैंने तो कुछ भी नहीं किया है साहब। पुलिस वाले ने कहा-तू कह रहा है, कुछ नहीं किया तो फालतू सड़कों पर क्यों घूम रहा है? पता नहीं तुझे, लॉकडाउन लगा है। मैं तुझे तीन दिन…