मालवी सम्राट चालीसा

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। गुरु प्रहलाद नमन करुं, लिखते अक्षर तौल। मालव भाष सम्राट हैं, व्याकरणा अनमोल।। जय गुरुदेवा जय प्रहलादा। पूत शारदा जीवन सादा।।1 मालव भाषा के अधिकारी। लेख कहानी लिखे विचारी।।2 गूजर गौड़ सद परिवारा। मां आवंती बेटा प्यारा।।3 पिता प्रभूजी बन हलवाई। दूर दूर भोजन बनवाई।।4 मार्च पंद्रह अड़तिस आया। फागुन होली उत्सव छाया।।5 जली होलिका प्रह्लाद आये। ग्राम कायरा जन हरषाये।।6 उपनयन संस्कार कराया । फिर शाला में नाम लिखाया।।7 गुरु माधव ने बाल पढ़ाये। हिन्दी संस्कृत ज्ञान सिखाये।।8 चिंतामणि को गुरु बनाया।।…

मैं माँ हूँ

गरिमा गर्ग, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। मैं माँ हूँ माँ होकर सारे फ़र्ज़ निभाउंगी सहूंगी सारे ताप बच्चों का स्वरक्षा चक्र बन जाऊँगी मैं माँ हूँ दूँगी उनको अच्छा जीवन चाहे पाई खुद पे ना खर्च कर पाऊँगी मैं माँ हूँ रहे बच्चों का भविष्य ऊँचा यही दुआं कर जिंदगी बिताऊँगी मैं माँ हूँ बेटा औऱ बेटी दोनों को नित्य दिनचर्या के काम सिखाऊंगी मैं माँ हूँ अपने जीवन की आयी हर मुश्किलों को उनके जीवन से दूर भगाऊंगी मैं माँ हूँ चाहिये जैसा दामाद ऐसा बेटे को बनाऊँगी मैं…

उ प्र के 75 जिले गायन में

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अली अयोध्या एट आगरा। बदा औरैया आजम बहरा।।8 अम्ब अमेठी बिज अमरोहा। बलिया बंडा बाग प्रयागा।16 देव बरेली बस्ती बारा। बल चंदोली फते इटावा।।24 बुलंद फिरोजा फर्रुखबादा। ललित लाखमी अरु महराजा।30 चित्र गाजिया गौतम गोंडा। हाथ हरदोइ जौन जलोना।।38 हमीर गोरख हापुड़ गाजी।। काशी कुशि कौशांबी झांसी।46 मेरठ मथुरा मेन महोबा। लखनउ मिरजा बाद मुरादा।।53 मुजफ्फर पीली रायबरेली। श्राव सिद्धार्थ शाह शामली।।60 संतकबीर संभल रैदासा। सीता शाहा अरु कन्नोजा।।66 प्रताप रामपुर अरु सरहाना। उन्ना वार सोन सुल्ताना।।73 कानपुर है नगर देहाती। जिला पचहत्तर…

ईश्वर! मेरी मम्मी का ख़याल रखना

डॉक्टर मिली भाटिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। मदर डे टू मम्मी इन हेवन… इन लविंग मेमोरी ओफ़ यू मम्मी… आज शब्द ही नहीं कुछ… आपको खोने का दर्द… काग़ज़ पर नहीं उकेर पाऊँगी आज… आप होतीं आज तो बात ही कुछ और होती… हर ख़ुशी में ख़ालीपन नही होता… हर दर्द से डर नहीं लगता… ईश्वर मेरी मम्मी का ख़याल रखना…..!! रावतभाटा, राजस्थान

“मां”

अर्चना त्यागी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। जब भी थकता हूं, तुम्हे ढूंढता हूं मां। जब भी हारता हूं, तुम्हे पुकारता हूं मां। तुम अब आती नहीं, तुम्हारी याद आती है। तुम अब बुलाती नहीं, तुम्हारी आवाज़ आती है। खोया था दुनियादारी में, पर तुम खास थी मां। न पहचान सका तुम्हारी कीमत, जब तुम पास थी मां। घूमता फिरता हूं, ढूंढ़ता फिरता हूं तुम कहीं दिख जाओ,मिल जाओ मां। हैरान होता हूं, परेशान होता हूं क्यूं रूठ गई हो? एक बार मान जाओ मां। कुछ तो मुझे बताओ मां एक…

बचपन चालीसा (13 मई जन्मदिवस पर विशेष)

डॉ. दशरथ मसानिया, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। बचपन से पचपन सुनो, जीवन का सब गान। परम पिता का साथ है, कहत हैं कवि मसान।। बालक भगवन रूप कहाई। निश्छल मूरति लगत सुहाई।।1 हंसते खेलत चित्र बनाते। उछलकूद कर मन बहलाते।।2 माटी के घर द्वार बनाये। पात फूल से मांच सजाये।।3 रूखा सूखा सब मिल खाते। तीज त्यौहार कपड़े पाते।।4 बाल पने से जंगल जाता। नितउठ भैसे गाय चराता।।5 वन के खेल बड़े सुखदाई। गुलाम डंडा पेड़ चढ़ाई।।6 पैरों में कांटे लग जाते। कभी कभी तो ठाठ बनाते।।7 लेज बालटी खेंचा…

प्रलय

राजीव डोगरा ‘विमल’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। सुधरो मानव सुधरो अब भी प्रलय बाकी है, गूँज रहा है जो नाद महाकाली का, उसमें काल का अब भी नृत्य करना बाकी है। बहुत तोड़ी है अहम में लोगो की नसें, अभी काल के द्वारा तुम्हें तोड़ना बाकी है। समझते थे तुमको सब मानव, मगर बनकर रह गए तुम एक दानव। तभी रण चंडी का हुंकार भर संहार करना अभी बाकी है। भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल ठाकुरद्वारा (कांगड़ा) हिमाचल प्रदेश

कहाँ खो जाती हूँ मैं 

डॉ अलका अरोडा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कोई जब पुकारता मुझको भला कुछ चाहता मुझसे मैं सुनकर सुन ना पाती हूँ सिर्फ मुझको बुलाता हो जाने कहाँ खो जाती हूँ मैं किसी को आस बन्धानी हो किसी को श्वास दिलानी हो किसी की प्यास बुझानी हो सिर्फ मुझको बुलाता हो जाने कहाँ खो जाती हूँ मैं जब बहुत तन्हा रहे कोई उसे कोई राह ना सूझे बेवजह तन्हाई में घूमे सिर्फ मुझको बुलाता हो जाने कहाँ खो जाती हूँ मैं कोई लम्हा जो जाता हो वो इक पल ना लौट…

रेत सी ज़िंदगी

डॉ.अवधेश कुमार “अवध”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। रेत – सी  ज़िंदगी  मुट्ठियों  में  भरी, कब फिसल जाय इसका भरोसा नहीं। खुल  न जाएँ किसी हाल में मुट्ठियाँ, बस  यही  डर  हमें जीने देता नहीं। टूट  जाए  नहीं  साँस  की  श्रृंखला, ढह  न  जाए  अटारी  बनी रेत की। रेत    है    ज़िंदगी, ज़िदगी   रेत  है, सोचने  में  कभी  रात  सोया  नहीं। भाईचारा  अगर  साथ  कायम  रहे, गर्मियों  में  अगर  रेत  में  हो  नमी। हौसला  हो  अवध  नेह के साथ में, रेत  की  ज़िंदगी में भी धोखा नहीं। मैक्स सीमेंट, ईस्ट…

भेड़चाल

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। भेड़चाल.. सदियों से द्विविधा जनित भंवर में फंसता है मानव बार-बार उठता कभी गगन छूनें को पकड नहीं पाता आकार चलता पग में ठोकर खाता फूल पल्लवों के लालच में तोड तोड कर अनायास पावन उपवन को करता घायल फिर भी मुडकर है वहीं खडा बेचैन विवश बेहाल भेडचाल… ललकार रहा है उस भुजंग को जो विषधर व प्यासा तरंग हो शासन की सत्ता जिनके पग में ज्यों वासुकी लपेटता मंदराचल को विष फेन निकलता ज्यों है तरल सब दूर भागते एक साथ…