खेते म यूरिया नाही

डॉ. रमाकांत क्षितिज, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। खेते म यूरिया नाही गोबर कय खाद डावात रहा टयूबिल नहर से नाय कुआं बैल पुर मोट से खेत सीचात रहा प्लास्टिक की पाइप से नाय बरहा से पानी खेते म जात रहा ट्रैक्टर से नाय हल बैल से खेत जुतात रहा मसीनी से नही हंसिया से फसल कटात रहा थ्रेसर से नाही बैलन से दवरी म गोहू मडात रहा राति म मनई दवरी म चलत रहा बरदा संग मनई कोल्हू की नाइ चलत रहा कुदारी फरुहा हल जुआठ सरावन हंसिया खुरपी खुरपा…

पितरों को प्रणाम

विनोद कुमार सीताराम दुबे, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। पितरों को प्रणाम पितर हमारे कुल के खातिर जीवन भर संघर्ष किए कुल की मर्यादा के खातिर सब-कुछ अपना निछावर किया हम बच्चों को उत्तम शिक्षा दे आगे बढ़ने का का मार्ग दिखाया पितरों ने हम-सब को सतपर चलते रहने का बोध कराया जाते-जाते घर-परिवार को ज्ञानी और कुल रक्षक बनाया आज पितर पक्ष के बेला में पितरों को बारमबार प्रणाम संस्थापक इन्द्रजीत पुस्तकालय एवं सीताराम ग्रामीण साहित्य परिषद जुड़पुर रामनगर विधमौवा मड़ियाहूं जौनपुर उत्तर प्रदेश

प्रिये! तुम झूठ बोलती हो

डॉ. अवधेश कुमार “अवध”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। उपभोक्तावादी समाज में, सब व्यापारी बने हुए हैं। हाथ तराजू कसकर जकड़े, डंडी जैसे तने हुए हैं।। क्या खोया,क्या पाया तुमने, कह दो कहाँ तोलती हो! प्रिये! तुम झूठ बोलती हो।। बापू – अम्मा की सेवा में, खड़ी हमेशा ही रहती हो। अपने सारे दर्द भुलाकर, बिन बोले सबकुछ सहती हो।। चर-चर चरखा जैसे घर में, तकली – सरिस डोलती हो। प्रिये! तुम झूठ बोलती हो।। दो कुल की मर्यादा के हित, दोगुण राज दबा लेती हो। पिता,पुत्र,पति,प्रेमी घर,तुम बेघर, स्वर्ग बना…

हिंदी दिवस पर अंग्रेजी का सच

डॉ. अ. कीर्तिवर्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अंग्रेजी का परचम फहराते जो घर घर में, उसको ही महान बताते जो सारे जग में, उनको अंग्रेजी का सार बताना चाहता हूँ, भूली बिसरी सी औकात बताना चाहता हूँ। अंग्रेजी अंग्रेजों के घर भी पिछड़ों की भाषा है, आज भी अंग्रेजी का आधार, फ्रेंच ही भाषा है, फ्रेंच में लिखना- पढ़ना, सबकी अभिलाषा थी। वर्तमान में अंग्रेजी नहीं बनी विश्व की भाषा है। चालीस प्रतिशत शब्द फ्रेंच के इसमे शामिल, व्याकरण का अंग्रेजी को कोई बोध नहीं है। नहीं लिखे गए बाइबिल…

आदत नहीं

डॉ. अ. कीर्तिवर्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। बन्धनों में रहने की मेरी आदत नही, खुद की खातिर जीने की आदत नहीं। बहता रहूं दरिया सा छोर से छोर तक, नहरों में सिमटकर बहने की आदत नहीं। पवन सा चलता निरन्तर गतिमान हूं, सूर्य के तेज सा प्रखर अभिमान हूं। रहता गगन में तारों संग चन्द्रमा बना, सृष्टि में शीतलता का भी प्रतिमान हूं। पर्वतों से उन्मुक्त झरना बन गिरूं, अनछुआ संगीत बन धुन में ढलूं। कल-कल निनाद करता बहने वाला, प्यास बुझाने हित छोटे सोतों सा बनूं।   53 महालक्ष्मी…

माँ ! तुम कैसे भाँप लेतीं 

गौरव हिन्दुस्तानी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।   मेरी देह का बढ़ता तापजब कभी ज्वर कारूप धारण करतामाँ ! तुम कैसे भाँप लेतीं |तुम्हारी कोमल हथेलियाँस्पर्श करती तपते माथे कोतुम जान लेतीं मेरे देह केउच्च-निम्न ताप को,थर्मामीटर की आवश्यकताफिर कहाँ रहतीमाँ ! तुम कैसे भाँप लेतीं |औषधियाँ भी हार जातीदहकती देह से,वैध होते जब संदेह में, तबठण्डे पानी में डूबातुम्हारा साड़ी का पल्लूजैसे संजीवनी बूटी हो जाता,कितना आराम पहुँचाता |कभी मेरा कुह्म्लाया चेहराकभी मेरी देह को पोछती, तुमअपनी ममता के आँचल से,तुम्हारी आँखों से गिरतीं पानी की बूँदें,देह के उच्च ताप…

देश बिक रहा है

डॉ. अ. कीर्तिवर्धन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अच्छी लगती हैं बातें भड़काने की उकसाने की लडवाने की और कमजोर को भी ताकत का अहसास कराने की। कहते हैं बेच देंगे नदी वन तालाब पर क्या सोचा हमने तुमने उसके संरक्षण का विचार? कितनी बार जाते हो नदी के तट कब कब करी पूजा आराधना पुष्प अर्पण शायद नहीं याद होगा अब यह सब क्योंकि अब आस्था नहीं है भीड़ लगती है अनेक लोगों का स्नान करना एक स्थान पर फूहड़ता लगती है घाट पर बैठे पंडित पण्डे ठग लुटेरे लगते…

ये हवा कुछ कह रही है

विनय सिंह विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। आज हवा कुछ कह रही थी.. पर हवा तो हमेशा से कहती आ रही है, कोई सुनता कहाँ है? बहुत तिमिलाहट भरी आवाज थी उसकी” कह रही थी.. असलहों की फसल लहलहा रही है कुछ धर्म को आग में लपेटकर.. समाज के सीने में बो रहे हैं। और..और कुछ बारुद की बोरियों को बड़े इत्मीनान से अनाज की जगह अपने घरों में सहेज रहे हैं। कुछ धारदार तलवार की तरह के खंजर आस्तीनों में छिपाकर घूंम रहे हैं। कुछ भूखे कह रहे थे…

जीने का सलीका

राजीव डोगरा “विमल”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। तुम शब्दों की बात करते हो हम तुम्हें निशब्द ही घायल कर देंगे। तुम खूबसूरती की बात करते हो हम तुम्हें सादगी से ही कायल कर देंगे। तुम हमें आधुनिकता के बोझ तले दबाते आये हो हम तुम्हें अपनी परंपराओं के बल पर ही उठ कर दिखा देंगे। तुम हमें दिखावे में पनपनमा सिखाते हो हम तुम्हें सादगी से ही तुम्हें जीना सिखा देंगे। युवा कवि लेखक व भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल ठाकुरद्वारा (कांगड़ा) हिमाचल प्रदेश

श्राद्ध

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। अपने पुरखों की आत्मा की तृप्ति के लिए वैदिक काल से हम करते आ रहे हैं श्राद्ध पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा जीवित है कौओं को पकवान खिलाकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं । सुनो साथियों – जीते जी अपने बुजुर्गों की ले लो सुध बाद मृत्यु के शोक मनाने, भंडारे करने का क्या मतलब ? पितृऋण अगर चुकाना चाहते हो, पितृमुक्ति अगर चाहते हो तो उनके जीते जी ही उनकी जीवित आत्मा को तृप्त करो । मरने के…