हार में है जीत

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कुछ समय जीता और कुछ लोग हार गये हारनें वाला अक्सर पीछे मुडकर और जीतने वाला आगे झुककर देखता है। बहुत हीं चित्कार पूर्ण आवाज रुदन को रोककर निकल गयी जीत की हुंकार… सीने को छलनी कर गयी। क्यों जीता है शरीर..? जब कि सर्वविदित है ये निरंतर मौत के पास हीं जा रहा है। खैर जीवन है जीतेगा हारेगा क्योंकि समय की साख पर निरंतरता सदैव विश्राम नहीं नृत्य मुद्रा को बदलती रहती है और परबस जीवन… उसकी थाप पर थिरकने को…

फितरत

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। हजारों पर्दे में महफूज होता है! मतदाता का हर एक मत” उम्मीदवार का कठिन प्रयास… जब वहाँ पहुंच नहीं पाता है, तब चुनाव हार जाता है?? बडा तिलस्मी जानवर है ये दो पाया” कम से कम तीन मुखौटों में सदैव सफर करता है” कहता कुछ,सोचता कुछ व करता कुछ है। इसको डर है!केवल दो सख्श से” मौत और अभाव” बस इन्हीं आपदाओं को” आजीवन कभी नहीं,स्वीकार पाता है। और..और वफा..तो इसके जुबान की मैल है” और धोखा इसकी फितरत का हिस्सा.. सदैव सब…

नव-सृजन

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कारवां थम सा गया है स्वांस भी रुकने लगी बस सब्र से देखो विनम्र” ये आ गयी कैसी घडी। ये अग्नि की भीषण लपट है छू रही आकाश को इत्मीनान से इंतजार में देखो खडी इस लाश को। सब्र भी जब टूटता है मूल सबको लूटता है गर्त के गुबार से नव सृजन फिर से फूटता है। राख उडकर हवा संग ढूढ लेती नया रंग बारिशों में भींगकर पुनः मिलती मूल संग।। ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश

मैं वापस आऊंगा

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कोरोना थोडा सा विश्राम के मूड में क्या हुआ, भारत में उन्माद का जश्न और लाकडाउन काल की पाबन्दियों को जैसे पर लग गये। प्रकृति के साथ सदैव से खेलता आया मानव अदृश्य वायरस के सम्मुख आज फिर निःसहाय लाचार पंगु और बौना दिखा। फिल्मी विलेन जैसा मार खाकर, शक्ति अर्जित कर पुनः मैदान में उपस्थित हुआ कोरोना आज अपनें उग्रता और चर्मोत्कर्ष की वजह से सरकारी तंत्र के लिये भी भीषण चुनौती प्रस्तुत कर चुका है। स्वास्थ्य संस्थायें और हमारे पृथ्वी के…

नवरात्रि की शुभकामनाएँ

डॉ.अवधेश कुमार “अवध”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। हे जग कल्याणी, वीणापाणी, सकल भुवन की माता । तुमको नित ध्वावैं, स्तुति गावैं, श्रीहरि विष्णु विधाता ।। मुझको अपनाओ, राह दिखाओ, पद दर्शन का भूखा । तेरे  बिनु  माता, अवध अनाथा, ममता वंचित  सूखा ।। नारी नित लुटती, ईज्जत मिटती, शक्ति स्वरूपा अबला । अब   पुन:  सँवारो, मातु  उबारो, कर दो   माते  सबला ।। बेटी  बिलखाती, मारी   जाती, पीड़ा  बहु   दुखदाई । बहनों  के  दुखड़े,अवनत  मुखड़े, नज़र  फेरते  भाई ।। कलमें भी बिकतीं, अवशा दिखतीं,सत्य राह दिखलाओ । अब बेटी बनकर, रूप…

चक्रवात

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। था व्योम घटामय तिमीर शांत, बढ आया तम बादल आक्रांत, निर्मोह सहित गर्जन अपार, निर्ममता करता तार-तार, मारुत का विप्लव बल अपार, अस्त व्यस्त करता प्रहार, वृक्षों के वक्षस्थल विशाल, कर भेदन जैसे तृन असार, भू के स्तर में कण अशेष, उड चले चपल प्रस्तर विशेष, अवनि निज धैर्य कहाँ बांधे, किस बल पर जीवन को साधे, जीवन डगमग ऐसे डोले, ज्यों काल प्रकट बम बम बोले, द्यूति प्रलय अशांति को बल देती, जो बचा धैर्य वो हर लेती, विस्मय आतंकित जीव हुआ,…

मानव के दुष्कृत्य

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। क्या रचा था प्रकृति ने! पहुंचा कहाँ इंसान है” कफन में लिपटा हुआ” खुद को मानता भगवान है। नदियों को विष से सींचकर संवेदना को पी गया” वृक्ष को निर्मूल करके स्वयं तक हीं जी गया। अब लघु कृमि के कोप से बिल्कुल व्यथित संत्रस्त है” स्वांस तक को जूझता, अपने दुष्कर्म से ये पस्त है।। ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश

ताबूत को श्रद्धांजलि

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। गड़े हुये ताबूतों से अब कील निकाली जायेगी, मुर्दों की पांवों से अब जंजीर निकाली जायेगी। जो जिन्दा हैं उन्हें नहीं अभी हार चढाया जायेगा, हार चढानें से पहले शमशीर निकाली जायेगी। जो अदृश्य हैं आज समर में उनकी प्रतिमाएं होगी, जिन्दों की रक्तों से उस पर रंग उभारी जायेगी। शासन की अब है मंशा प्रतिमान नहीं प्रतिमा हीं हो, प्रतिमान यदि दिखलाई दे तो खाल उतारी जायेगी। हर अंधो की बस्ती में दीपक का उजियारा होगा, दृष्टि दोष से जो गाफिल आंख…

अतीत का अंश

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। कल कोई बचपन मरा है” तब खडा है आदमी वक्त के अहसान में जिंदा पडा ये आदमी। कब्रे मंजिले की फकत, निर्माण की भट्टी में तप किस सिलसिले की फिक्र में किसने गढा ये आदमी। दर्द,सोहरत आंसुओं के बारिशों में भींगता सदियों से लेकर अब तलक क्यों चलता रहा ये आदमी? धर्म का ओढे कफन और कर्म की चादर लिये जज्बात की इन आंधियों में ढलता रहा ये आदमी। सत्य की इसे फिक्र है? पर झूठ की इसको जरुरत पेट की भीषण तपन…

सत्य की पहचान

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। तुम्हें क्यों जुदाई की तड़प? मुझे सत्य की पहचान है कठपुतलियों के ऐ दिवानों उंगलियों में जान है अपनी परछाईं से मैं अक्सर बताता हीं रहा ऐ दोस्त तु मेरा नहीं मेरे शरीर का मेहमान है। ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश