मानवता और प्रेम

कुँवर आरपी सिंह,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक साम्राज्ञी ने मृत्यु उपरान्त उसकी कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का आदेश दिया था- “इस कब्र में अपार धनराशि गड़ी हुई है, जो व्यक्ति अत्याधिक निर्धन और आशक्त हो वह इसे खोदकर प्राप्त कर सकता है।” उस कब्र के पास से हजारों निर्धन, दरिद्र और भिखमंगे निकले, लेकिन उनमें से कोई इतना दरिद्र नहीं था जो धन के लिए किसी की कब् खोदे।अन्ततः एक दिन वह व्यक्ति भी आ पहुंचा, जो उस कब्र को खोदे बिन ना रह सका। जानते हैं वह व्यक्ति कौन था? वह एक सम्राट था और उसने इस देश को अभी अभी जीता था। यहाँ आते ही उसने कब्र खोदने का काम शुरू कर दिया था। उसने थोड़ा भी समय खोना ठीक नहीं समझा, पर जानते हैं उस कब्र में उसे क्या मिला ? अपार धन सम्पदा की जगह मिला एकमात्र पत्थर जिस पर लिखा था”-मित्र क्या तुम मनुष्य हो ?  निश्चय ही जो मनुष्य है, वह मृतक को सताने के लिए कैसे तैयार हो सकता है? लेकिन जो धन के लिए जीवित को भी मृत बनाने को सहर्ष तैयार हो, उसे इससे क्या फर्क पड़ता है।
निराश और अपमानित होकर उस कब्र से लौटते समय उस सम्राट ने वहाँ रहने वाले बूढ़े भिखारी को जोर जोर से हँसते हुए देखा। वह भिखमंगा कह रहा था-मैं कितने वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था। अन्ततः आज पृथ्वी पर जो दरिद्रतम, निर्धन और सर्वाधिक आशक्त व्यक्ति है, उसके दर्शन हो गए। प्रेम जिस हृदय में नहीं है, वही दरिद्र है वही दीन है, वही अशक्त है। प्रेम शक्ति है, प्रेम सम्पदा है, प्रेम प्रभुता है।  प्रेम में तुम्हारी जितनी गहराई होगी, मानवता में उतनी ही ऊँचाई होगी।  प्रेम के अतिरिक्त जो किसी और सम्पदा में खो जाता है। एक दिन उसकी ही सम्पदा उससे  पूंछती है “क्या तुम मनुष्य हो”।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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