आज भी है रहस्य शिमला के पटाखरा में पांडवों द्वारा लिखित पुरालेख

डा. हिमेन्द्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

शिमला जिला की कुमारसैन तहसील के अंतर्गत लुहरी-सुन्नी मार्ग पर सतलुज नदी के किनारे पटाखरा स्थान पर पांडवों द्वारा चट्टान पर लिखी चंद पक्तियां आज तक रहस्य बनी हुईं हैं। बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में पांडव तीन बार आए और यहां वनों, बीहड़ों व नदी घाटी में आखेट, पूज्य स्थल स्थापना और आततायी राक्षसों का संहार करके जन मानस में शास्वत काल के लिए अमर हो गए। उपरोक्त तीन यात्राओं के अतिरिक्त पांडु पुत्र अर्जुन महाभारत युद्ध से पूर्व कुल्लूत गणराज्य के अंतर्गत नग्गर के समीप शिव से अमोघ शस्त्र पाशुपातास्त्र पाने के लिए शिव को प्रसन्न करने के लिए आए थे। कुल्लू के प्रीणी के समीप आज भी वह स्थान अर्जुन गुफा के रूप में प्रसिद्ध है। युद्धोपरान्त दिग्विजय के दौरान भी पांडव इस हिमालयी क्षेत्र में आए और पर्वतीय शासकों ने आधिपत्य स्वीकार कर उन्हे भेंट प्रस्तुत कीं थी।
हिमाचल प्रदेश में पांडव माता कुन्ती सहित लाक्षागृह की घटना के बाद आए। इस काल कण्ड से जुड़ी अनेक घटनाएं यहां जनमानस में प्रचलित हैं। कई स्थानों के प्रचलित नाम पांडवों अथवा महाभारत की घटनाओं से सम्बंधित हैं। लाक्षागृह की घटना के उपरांत पांडव झद्म भेष में कुलूत गणराज्य में रहे। यहां के असुर राज हिडिम्ब का भीम ने वध कर उसकी बहिन हिडिम्बा से गंधर्व विवाह किया था। ऐसी लोकमान्यता मण्डी के सुकेत क्षेत्र में प्रचलित है कि वैदिक नगरी पांगणा के शिव मंदिर में भीम व हिडिम्बा ने गंधर्व विवाह शिव को साक्षी मानकर सम्पन्न किया था। यह मान्यता है कि सुकेत की आदि राजधानी पांगणा में पांडव लाक्षागृह की घटना के बाद कुछ समय तक रहे थे। पांगणा का नाम पांडवांगन अर्थात् पांडवों का क्रीड़ास्थल का अपभ्रंश माना जाता है। पांगणा के पश्चिम में पांगणा सरिता के किनारे पांडवों ने उत्तरवाहिनी नामक स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी। यहीं समीपस्थ घाड़ी नामक स्थान पर शिवालय स्थापित किया था। आज उपरोक्त दोनों स्थल पवित्र व तीर्थस्थल रूप में सुविख्यात हैं। करसोग के ममलेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार पांडवों द्वारा लाक्षागृह की घटना के बाद किया माना जाता है। सतलुजघगाटी में सुकेत के तेबन में पांडवों द्वारा  तेबनी महादेव के मंदिर निर्माण की मान्यता प्रचलित है। मण्डी-सुकेत के धमूनी नाग अर्जुन का रूप भी माने जाते हैं।


मण्डी शहर से कुल्लू की ओर पण्डोह स्थान का सम्बंध पांडवों से जुड़ा है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से पंडोह पांडवों का अपभ्रंश होना युक्ति संगत भी लगता है। मण्डी के सराज क्षेत्र में जंजैली के समीप पांडव शिला पांडवों के यहां विचरण को प्रमाणित करती है। मण्डी की जंजैहली घाटी में बूढ़ा केदार तीर्थ पर भगवान शिव के वाहन नदी की पूंछ के चिंह की पूजा पांडवों से जुड़ी घटना का परिणाम है। मान्यता है कि जब पांडव कुल बांधवों की हत्या के पाप के निर्वाणार्थ नंदी का यहां पीछा करने लगे तो नंदी भूमिगत हो गये। कुष्ठग्रसित पांडु पुत्र भीम ने नदी को पूछ से स्पर्श कर रोग से मुक्ति पाई थी। मण्डी की जंजैहली घाटी के अतुंग शिखर शिकारी पर अवस्थित शिकारी माता ने पांडवों को दर्शन देकर विजयश्री का वरदान पांडवों को दिया था। महाभारत युद्ध की घटना के बाद भगवान कृष्ण के कहने पर पांडवों ने युद्ध के निरपेक्ष दर्शी रत्न यक्ष कमरू नाग को नाचन क्षेत्र के कुमराह में प्रतिष्ठित किया था।
पांडव सतलुज, ब्यास व पब्बर नदी घाटियों में विचरण करते रहे। यहां के जनमानस में कई ऐसी मान्यतायें व्याप्त हैं कि अमुक स्थान पांडवों से सम्बंधित है। पब्बर घाटी में अवस्थित हाटकोटी को महाभारतकालीन विराट नगर माना जाता है, जहां पांडव अज्ञातवास काल में छद्म भेष में राजा के महल में रहे। हाटकोटी में प्रतिष्ठित आदिशक्ति के मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया माना जाता है। हाटकोटी मंदिर के प्रांगण में शिखर शैली के पांच लघु पाषाण मंदिर पांडवों को समर्पित हैं।
सतलुज घाटी के किनारे पांडवों  से जुड़े स्थान व संदर्भ और स्थानों का नामकरण पांडवों से होना इस बात की पुष्टि करता है कि पांडवों ने निश्चय ही हिमालय के इस क्षेत्र में दुर्योधन के गुप्तचरों से बचने के लिए पनाह ली होगी। सोलन जिले की बाड़ी धार चोटी पर पांडव भाईयों के अग्रज युधिष्ठिर से मिलने आना यहां पांडवों के विचरण की पुष्टि करता है। सतलुज घाटी में स्थित बाड़ी धार से हिमालय के उंच्चस्थ व अगम्य क्षेत्र की ओर बढ़ते पांडव शिमला की सुन्नी तहसील के भज्जी क्षेत्र के अंतर्गत पंदोआ आए जो सुन्नी-लुहरी मार्ग पर बसा गांव है। किंवदंति है कि यहां पांडवों ने महादेव के श्रीविग्रह शिवलिंग की प्रतिष्ठा की। पंदोआ पांडवों शब्द का ही बिगड़ा रूप है। यहां देवता पंदोई पांच विग्रहों के रूप में विराजमान है। लोक मान्यता में पांच विग्रह पांच पांडव ही माने जाते हैं। पांच विग्रहों में सर्वप्रमुख मूल युधिष्ठिर ,ढैवकर अर्जुन, वजीर नकुल, शीर भीम व शरदैवल सहदेव रूप में प्रतिष्ठित हैं। पंदोआ से लुहरी की ओर लगभग छ: किमी की दूरी पर झुनझुन गांव के समीप पटाखरा में पांडवों ने अपाठ्य लिपि में सड़क के किनारे सतलुज के बायीं ओर कुछ पक्तियां चट्टान पर लिखीं हैं, जो सैंकड़ों वर्षों से खोजकर्ताओं के लिए कौतुहल बनीं हुईं है। शिमला गजेटीयर 1910 में भी इन पक्तियों का उल्लेख है। जन विश्वास है कि जब पांडव अज्ञात वास काल में यहां से गुजरे तो उन्होने सोने का कलश सतलुज के दायीं या बायीं ओर सुकेत या शिमला के क्षेत्रों  में छुपा रखा है। इन पक्तियों को किसी यायावर साधु ने पढ़ा जिसमें यह लिखा था-
आखरा पटाखरा झुंझणा ड्वार, सुनयां चौंरू आर की पार….
अर्थात् नदी पार आखरा व नदी के इस ओर पटाखरा है जहां झुनझुन का ड्वार यानी कंदरा है। हमने इन दोनों स्थानों में से कहीं एक जगह सोने का कलश छुपा रखा है। कहते हैं कि इन पक्तियों को पढ़ेने बाद उस साधु की मृत्यु हो गई थी। ये पक्तियां दस-बारह फुट की उंच्चाई पर काली स्याही से लिखीं हैं। यह पक्तियां दो स्थानों पर लिखी हैं और सुन्दर सुडौल शब्दों में लिखीं हैं। प्रत्यक्ष दर्शियों ने दशकों से इन पक्तियों को यूं ही देखा है। ये पक्तियां समय से थपेड़ों बिलकुल भी धूमिल नहीं पड़ीं हैं। लोक मान्यताओं की कड़ियों को गर जोड़ा जाये तो सम्भव है कि पांडवों ने राज्य त्याग के बाद स्वर्गारोहण का यही मार्ग चुना हो। चूंकि सतलुज व गिरि घाटी की सीमा पर अवस्थित शिखिर वासिनी हाटू की काली को द्रौपदी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि पांडवों का स्वर्गारोहण सतलुज उपत्यकाओं होते हुआ था। हाटू में पहुंचकर दौपदी का प्राणांत हो गया। यहीं द्रौपदी पांचाली देवी रूप में प्रतिष्ठित हुई थी।

हाटू में भीम के चूल्हे नाम से बड़ी शिलाओं के स्वरूप हैं, जो पांडवों के यहां प्रवास के गवाह हैं। पटाखरा में पांडवों द्वारा लिखित पक्तियों की परिपुष्टि लोक साहित्य में सतलुज व पब्बर घाटी के देव गाथा भारथा या घड़ासणी में मिलती है। कुमारसैन के समीप कचेड़ी में महालक्ष्मी स्वरूपा आदि शक्ति कचेड़ी की घड़ासणी में पांडवों का उल्लेख निहित है। हालांकि घड़ासनी की अंतर्वस्तु में दैवीय ऊर्जा के सन्निहित होने के कारण प्रकाशन वर्जित है। यह निश्चित है कि पांडव जीवन के विकट काल में, दैवीय आयुधों को प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए, दिग्विजय और स्वर्गारोहण के दौरान नगाधिपति हिमालय का आश्रय लेते रहे हैं। उनके यहां विचरण व प्रवास का वर्णन लोक गीतों, लोक कथाओं, लोक गाथाओं व जनश्रुतियों में बिखरा पड़ा है। त्रिगर्त क्षेत्र के शक्ति स्थल ज्वाला जी के मंदिर निर्माण का संदर्भ लोक गीत में मिलता है-
पांजै पांजै पांडवै मैया तेरा भवन बनाया
सोने दा छतर चढ़ाया जोता वालिये….
त्रिगर्त-कांगड़ा का प्रख्यात दुर्ग नगरकोट पांडुपुत्र भीम से सम्बद्ध होने के कारण पूर्व में भीमकोट नाम से प्रसिद्ध था। पांडव व कौरव यहां की युद्ध प्रिय जाति समूह कनैतों की कबीला व्यवस्था व बिरादरी के आज भी कुलपुरूष माने जाते हैं। सतलुज-यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्र-शिमला, सिरमौर व सोलन में कौरव व पांडवों को स्वयम् के वंशपुरूष मानने वाले क्रमश: शाठी और पाशी खुंद अथवा बिरादरियां बसीं हैं। बैसाख महीने में बिशू मेलों में कोरवों के प्रतिनिधि शाठी और पांडवों के प्रतिनिधि पाशी तीर-कमान युद्धनृत्य ठोडा का आयोजन होता हैं। पूर्व में ठोडा नृत्य  रक्तरंजित संघर्ष में परिणत हो जाता था। ठोडा नृत्य में जाने से पूर्व नर्तक समूह कबीले के क्षेत्र में युद्ध देवी काली माता के मंदिर ठौड़ में विजयश्री के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। शाठी व पांशी दल एक-दूसरे के विरूद्ध ही संघर्षयुक्त नृत्य करते हैं। पूर्वकाल में ठोडा नृत्य में जीतने वाले दल विपक्षी दल के किसी सदस्य का सिर छेदन कर अपनी ठौड़ में प्रतिष्ठित करते थे। शिमला जिले के मूल मतियाना की ठोडा नृत्य टोली शाठी पक्ष के माने जाते हैं। कहा जाता है कि इस ठौड़ में शत्रु पक्ष के बीस सिर दफन हैं। लोक साहित्य, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक पक्ष की दृष्टि से यह कहना युक्ति संगत होगा कि पटाखरा में पांडवों द्वारा लिखित शिलालेख हिमाचल प्रदेश की पुरातनता का द्योतक है। हिमाचल की लोक संस्कृति को कुरू वंश के आधिपत्य व पांडवों द्वारा धर्म-संस्कति स्थापना ने गहरे तक प्रभावित किया है।

इतिहासकार व साहित्यकार नारकण्डा, हिमाचल प्रदेश

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