शिवपुराण से……. (260) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादि की धराओं से शिवजी की पूजा का माहात्म्य……….
उत्तम भस्म धारण करके उपासक को प्रेमपूर्वक नाना प्रकार के शुभ एवं दिव्य द्रव्यों द्वारा शिव की पूजा करनी चाहिए और शिव पर उनके सहस्रनाम मंत्रों से घी की धारा चढ़ानी चाहिए। ऐसा करने पर वंश का विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार दस हजार मंत्रों द्वारा शिवजी की पूजा की जाये तो प्रमेह रोग की शान्ति होती है और उपासक को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई नपुंसकता को प्राप्त हो तो वह घी से शिवजी की भलीभांति पूजा करे तथा ब्राह्मणों को भोजन कराये। साथ ही उसके लिए मुनीश्वरों ने प्राजापत्य व्रत का भी विधान किया है। यदि बुद्धि जड़ हो जाये तो उस अवस्था में पूजक को केवल शर्करामिश्रित दुग्ध की धारा चढ़ानी चाहिए। ऐसा करने पर उसे बृहस्पति के समान उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जाती है। जब तक दस हजार मंत्रों का जप पूरा न हो जाये, तब तक पूर्वोक्त दुग्धधारा द्वारा भगवान् शिव का उत्कृष्ट पूजन चालू रखना चाहिए। जब तन-मन में अकारण ही उच्चाटन होने लगे-जी उचट जाये, कही भी प्रेम न रहे, दुख बढ़ जाये और अपने घर में सदा कलह रहने लगे, तब पूर्वोक्त रूप से दूध की धारा चढ़ाने से सारा दुख नष्ट हो जाता है। सुवासित तेल से पूजा करने पर भोगों की वृद्धि होती है। यदि मधु से शिव की पूजा की जाये तो राजयक्ष्मा का रोग दूर हो जाता है। यदि शिव पर ईख के रस की धारा चढ़ायी जाये तो वह भी सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति कराने वाली होती है।

(शेष आगामी अंक में)

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