आज भी प्रासंगिक है गांधीजी का शिक्षा दर्शन

डॉ. राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

गांधीजी का शिक्षा दर्शन आज भी प्रासंगिक है। उनका मानना था कि आत्मा की शिक्षा पवित्र ग्रन्थों से नहीं मिलती बल्कि यह तो जीवन और आचरण से आती है।घर के अंतरंग सम्बन्ध ही सारी नैतिक एवम सामाजिक शिक्षा की नींव है।जब देश मे अंग्रेजी शासन था उस समय अंग्रेजी शिक्षा के जन विरोधी चरित्र को लेकर गहरी पीड़ा लेकर महात्मा गांधी हमारे सामने प्रकट हुए।उन्होंने अंग्रेजों द्वारा थोपी गई शिक्षा का पुरजोर विरोध किया। बापू ने कहा था कि भारत की जनता को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है।मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली वह सचमुच गुलामी की नींव थी। अंग्रेजी शिक्षा से अत्याचार बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा से जनता को ठगा जा रहा है। महात्मा गांधी गीता का अध्धयन किया करते थे। वे कहा करते थे कि यदि आध्यत्म को समझना है तो गीता पढो। यह वेदों का सार है। वे कहा करते थे कि मैंने हमेशा ही ह्रदय की संस्कृति और चरित्र निर्माण को पहले स्थान पर रखा है। गांधी जी ने अपनी शिक्षा योजना जब बनाई तो सबसे पहले माध्यम हिन्दी हो इस पर जोर दिया। उन्होंने कहा भारत के विभिन्न प्रान्तों में शिक्षा देने का कार्य वहाँ की मातृभाषा में ही किया जाना चाहिए।
1945 में राष्ट्रीय शिक्षा योजना तैयार की गई जो देश मे नई तालीम बुनियादी शिक्षा बेसिक शिक्षा के नाम से प्रसिद्ध हुई। बुनियादी शिक्षा के पीछे गांधी जी की सोच थी कि युवा किसी न किसी व्यवसाय से जुड़ें, हुनर होना चाहिए युवाओं के पास। शिक्षा को व्यवसाय से जोड़ें। आज भी हम व्यवसायिक शिक्षा की बात करते हैं । गांधी जी के शिक्षा सम्बन्धी विचार आज भी प्रासंगिक है। बुनियादी शिक्षा महत्वपूर्ण एवम बहुमूल्य हों। यह उत्पादन पर जोर देते हैं। अध्यापकों की पृष्ठभूमि उच्च कोटि की हो, वे अपने कार्य मे प्रवीण हो कुशल शिक्षक बने। गांधी जी ने कहा था कि बच्चों को 7 वर्ष तक राष्ट्रव्यापी निशुल्क शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। इस दौरान दी जाने वाली शिक्षा हस्तशिल्प या उत्पादक कार्य पर केंद्रित हो।बच्चों के पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए बच्चों द्वारा चुनी हुई हस्तकला से सम्बंधित हो। बुनियादी शिक्षा का उद्देश्य दस्तकारी के माध्यम से बच्चों का शारीरिक बौद्विक व नैतिक विकास करना है।इस शिक्षण में लड़के लड़कियां सभी सीखें। गांधी जी शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि या मस्तिष्क के विकास तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसे सम्पूर्ण साधना पद्धति के रूप में चलाना चाहते थे। उनकी दृष्टि में शरीर के विकास के साथ ही आत्मा का विकास भी शिक्षण का अविभाज्य अंग होना चाहिए ।
गांधी जी का मूल मंत्र शोषण विहीन समाज की स्थापना करना उसके लिए सभी को शिक्षित होना चाहिए क्योंकि शिक्षा के अभाव में एक स्वस्थ समाज का निर्माण असम्भव है। शिक्षा बालक के मानवीय गुणों का विकास करना है।सभी विषयों की शिक्षा स्थानीय उत्पादन उद्योगों के माध्यम से दी जाय। शिक्षा ऐसी हो जो नवयुवकों को बेरोजगारी से मुक्त कर सके। गांधीजी का आदर्श “सा विद्या या विमक्तये”यानि शिक्षा ही हमें समस्त बन्धनों से मुक्ति दिलाती है । अतः गांधीजी शिक्षा के द्वारा आत्म विकास के लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता देना चाहते थे। शिक्षा के सर्वोच्च उद्देश्य के अंतर्गत वे सत्य अथवा ईश्वर की प्राप्ति पर बल देते थे। अतः मनुष्य का अंतिम एवम सर्वोच्च उद्देश्य आत्मानुभूति करना है।
गांधी जी ने शिक्षण विधियों का जिक्र करते हुए कहा था करके सीखना और स्वयं के अनुभव से सीखना, सह सम्बन्ध विधि से शिक्षा देने की बात कही।
गांधी जी का शिक्षा दर्शन आदर्शवाद प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद का समन्वय है।

साहित्यकार भवानीमंडी (झालावाड) राजस्थान

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