यकीन

विनय सिंह “विनम्र”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

जीत पर इतना यकीन मत करो,
की हार पे रोना आये।
ख्वाब में हो मखमली लेकिन”
सामनें पत्थर का बिछौना आये।
ये वक्त है तिलस्म का खंजर रखता”
भार इतना हीं रहे जो आराम से ढोया जाये।
शोर क्यों है हवाओं में सबलता का?
पास ऐसा क्या है जिसे’
तहजीब से संजोया जाये।
जन्म,मृत्यु,हानि,लाभ,सब है उसी के हाथ”
शरीर की मिट्टी में क्यों?
बीज उन्माद का बोया जाये।
यश”अपयश”भी प्रकृति पास रखती है विनम्र”
कौन सा धागा बचा”
जिसमें अहंकार पिरोया जाये।
जीत से उम्मीद इतना मत रखो!
हार पे रोना आये।।
ग्राम मझवार खास, चन्दौली उत्तर प्रदेश

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