हिमाचली लोक संस्कृति का प्रतीक है शिवरात्रि

उमा ठाकुर, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल के आँचल में बसा हिमाचल तपोभूमि है, हिमालय के ऊँचे टीले पर शिव का निवास स्थान है। इसी वजह से यहाँ शिव गौरी के कई उत्सव मनाने की परंपरा हैं, जिसमें गौरी तृतीय, हरितालिका, निर्जला एकादर्शी और शिवरात्रि खास है। वैसे तो हिमाचल के प्रत्येक जिलों में भौगोलिक परिस्थिति के कारण इस त्यौहार को मनाने में थोड़ा बहुत अन्तर जरूर है, लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं है। मण्डी में जहाँ देव परम्परा के मिलन स्वरूप शिवरात्रि मनाई जाती हैं। उपरी शिमला जैसे कि कोटगढ़, कुमारसैन, ठियोग, शिलारू, रोहडू, जुब्बल कोटखाई रामपुर आदि क्षेत्रों में शिव ‘मण्डल’ सजा कर शिव पार्वती की अराधना, परिवार के सभी सदस्य मिलकर करते हैं। रात भर शिव भक्ति के गीत गाये जाते हैं, जिन्हें कोटगढ़ कुमारसैन में ‘’आँचड़ी’’ रोहडू़ में ‘जती’ और कहीं-कहीं ब्रह्म अखाड़ा भी कहते है।
हिमाचल देव भूमि है। यहाँ के लोगों का जीवन बड़ा ही सीधा-साधा और धार्मिक भावना से ओत-प्रोत है। लोक जीवन के विविध रंग रीति-रिवाज परम्पराएं, वर्ष भर चलने वाले मेले और त्यौहार, लोक गीतों की स्वरलहरियां जीवन को खुशनुमा बना देती है। देव परम्परा व अनुष्ठान प्राचीन मान्यताओं को आज भी जीवित रखे हुए है। पहाड़ी लोक संस्कृति एक अथाह सागर है। हिमाचल प्रदेश के सभी जिलों में किसी न किसी धार्मिक पौराणिक कथा या फिर स्थानीय पृष्ठ भूमि से जुड़े मेले और त्यौहार वर्ष भर चलते रहते हैं। महिलाएं महीना भर पहले से ही शिवरात्रि की तैयारी में जुट जाती है। शिलारू की ज्ञानी शर्मा के अनुसार पांरपरिक पहाड़ी पकवानों में, पकैन, सनसे चूड़े, बड़े, इंडरे, शिव रोट, आटे के बाकटू बनाये जाते है और भोग स्वरूप शिव मण्डल में शाम को सजाये जाते है। मिट्टी का शिव ‘महादेव’ बनाया जाता है और घर का मुख्या पूरे विधि विधान के साथ पाजे की पत्तियों पर स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू करते है। रात भर गाँव के सभी घरों में जाकर ‘आँचड़ी’ गीत गाये जाते हैं। सुबह शिव मण्डल समेट कर बहते पानी के पास रखा जाता है और परिवार तथा समाज की सुख समृद्धि की कामना की जाती हैं। शिवरात्रि में बने पकवान को घर की बेटी, बुआ और सभी रिश्तेदारी में आदपूर्वक बांटा जाता है, जिससे आपसी मेल-जोल व प्रेम-भाव बढ़ता है।

आँचड़ी
सांमी आजे पाहुणे म्हारे
सांमी आजे पाहुणे म्हारे
केथे आजे नेड़ी के दूरो
केथे आजे नेड़ी के दूरो
सांमी आजे पोरे गो दूरो
सांमी आजे पोरे गो दूरो
सांमी के मोंढड़ो पूरो
सांमी के मोंढड़ो पूरो
सांमी आजे पारेखी टीरो
सांमी आजे पारेखी टीरो
सूने रो छोतरो पीरो
सूने रो छोतरो पीरो
सांमी आजे वावड़ी बागे
सांमी आजे वावड़ी बागे
छेडू छोटी कोदके लागे
छेडू छोटी कोदके लागे
भोड़े बाबा भोड़े बाबा
भोड़े बाबा भोड़े बाबा ।।
सुनीता नामंटा के अनुसार रोहडू क्षेत्र में शिवरात्रि परांपरिक रिति-रिवाज से मनाई जाती है। यहां पर यह पर्व तीन दिन तक चलता है। पहले दिन माश भिगोये जाते है, जिसे पहाड़ी भाषा में ‘मशरूईन’ कहते है। दूसरे दिन सुबह भिगोएं हुए माश की खिचड़ी बनती है और शाम को ‘खबलैच’ मनायी जाती है, जिसमें कि पुराने समय में ‘खोबली’ बनायी जाती थी, परन्तु वर्तमान इस पकवान की जगह ‘सिड्डू’ ने ले ली है। तीसरे दिन ‘पूजणी’ होती है। सबसे पहले घर का चुल्हा-चौका करके शिवजी के नाम को आटे का रोट और आटे के बाकटू बनाये जाते हैं। इसके बाद सारा दिन कई तरह के पकवान जैसे-बडे़, पोलडू, शाकुली, मालपूडें, ओगल के लौटे आदि बनाये जाते हैं और पूजा लिए चावल का ‘नेवज’ बनाया जाता है। साथ ही एक बेल पत्र का महादेव बनाया जाता है, जिसमे कि जौ और ‘कींप’ (संतरा प्रजाति का फल ) प्रयोग किया जाता है। शाम को भजन कीर्तन कर शिवजी की पूजा की जाती है। इस क्षेत्र में आँचड़ी गीत गाने की परंपरा नहीं हैं। यहां पर महादेव के मंडप में महिलाएँ अपने पांरपरिक आभूषण और बच्चे अपनी पुस्तकें रखते हैं और सुबह चार बजे मीठा भोग लगा कर बेल पत्र के महादेव को कमरे से बाहर बरामदे में लटकाना शुभ माना जाता है। उसी दिन घर की बेटी, बुआ और सभी सगे-संबंधियों की ‘बासी’ खाने बुलाया जाता है और कुछ को आदरपूर्वक पकवान भेजे जाते हैं।

शिव आस्था का प्रतीक शिवरात्रि वैसे तो पूरे हिमाचल में मनाया जाने वाला त्यौहार है, परन्तु प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी छोटी काशी यानि मण्डी में मनाया जाने वाला शिवरात्रि का त्यौहार अन्तराष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान बना चुका है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से शुरू होने वाले उत्सव में आस पास के ग्रामीण इलाकों से दो सौ से भी देवी-देवता रेग बिरंगे देव रथों में अपने-अपने देऊलु के साथ पधार कर इस उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। महाशिवरात्रि में निकलने वाली माधोराय की जलेब मेले का मुख्य आकर्षण होती है। भूतनाथ मंदिर व टारना मंदिर सहित सभी मंदिर इस उत्सव के दौरान विशेष रूप से सुसजित रहते हैं और श्रधालुओं का इन मंदिरों में तांता लगा रहता हैं। मण्डी शिवरात्रि उत्सव की अगर हम बात करें तो ऐसी मान्यता हैं कि मंडी पहले राजा बाणसेन मनाया और उनके बाद के राजाओं-कल्याण सेन, हीरासेन, धरित्री सेन, नरेद्र सेन, दिलावर सेन आदि ने भी इस परंपरा को कायम रखा, किन्तु राजा सूरज सेन (1637) के समय इस उत्सव को नया आयाम मिला। आदिकाल से चली आ रही इस उत्सव को मनाने की परम्परा वर्तमान में भी बसंत के आगमन के साथ शुरू हो जाती है। मण्डी शिवरात्रि अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है। इस मेले में जहां लोगों को यहाँ की संस्कृति व देव परंपरा का आभास होता है, वहीं पर्यटकों को यहाँ के खान-पान का भी पता चलता है। मेले में जहाँ देवी-देवता ऐतिहासिक पडडल मैदान में आपस में मिलने में व्यस्त रहते है। प्रशासन द्वारा दूर-दराज से आये लोगों व पर्यटकों के मनोरंजन के लिए प्रदर्शनियों व रात्रि महोत्सव का आयोजन भी किया जाता है। पारंपारिक परिधान व व्यंजनों की प्रर्दशनियों से प्रयर्टको देव संस्कृति व लो परंपराओं को नजदीक से देखने व समझने का मौका मिलता है, जो एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को साकार सिद्ध कर सकता है।
वर्तमान परिपेक्ष्य की हम बात करें तो आज भी शिवरात्रि हर घर में धुम-धाम से मनाई जाती है, शहर में बसे लोग इस बहाने गाँव की मुंडेर छू लेते हैं, परन्तु शिवरात्रि में गाए जाने बाले आँचड़ी, जती गीत वक्त के साथ-साथ धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। मैंने हाल ही में अपनी पुस्तक ‘‘महासुवी लोक संस्कृति’’में इन पांरपरिक शिव भक्ति के गीतों ‘‘आँचड़ी’’ को सहेजने का छोटा सा प्रयास किया है जो आने वाली पीढ़ी के लिए निश्चित ही साथ सिद्ध होगा।

आयुष साहित्य सदन लोअर पंथाघाटी शिमला, हिमाचल

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