पिछले 5 महीने से शिक्षकों की सैलरी रोकने पर दिल्ली विश्वविद्यालय एवं केजरीवाल सरकार आमने-सामने

शि.वा.ब्यूरो, नई दिल्ली। केजरीवाल सरकार केंद्र सरकार का अनुकरण कर रही है। इनका नियम, कानून और नैतिकता की दुहाई देने वाला दौर खत्म हो चुका है और अब ये अपने असली रूप को दिखा रहे हैं। मोदी सरकार एवं दिल्ली में केजरीवाल सरकार दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय पर गिद्ध दृष्टि जमाए हुए बैठी हुई है। दोनों ही सत्ताधारी दल पूंजीपतियों का पोषण करने के उद्देश्य से नई शिक्षा नीति के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय निजीकरण की सोच को आगे बढ़ाने के लिए व्यवहारिक रूप में काम करना शुरू कर दिया है। कुछ समय पहले अरनव गोस्वामी की चैट में पुलवामा घटना होने से पहले ही कुछ मीडिया कर्मियों को इस बात की जानकारी थी कि पुलवामा अटैक राजनीतिक उद्देश्य से लोगों से वोट लेने का एक साजिश थी। स्टेट में यह भी पाया गया था कि अरनव गोस्वामी के मैसेज चैट में यह भी जिक्र करते हुए पाया गया कि आने वाले समय में दिल्ली विश्वविद्यालय को जिओ यूनिवर्सिटी में बदलने का सरकार की योजना है, जिसका जीता जागता उदाहरण हम दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले सैकड़ों दिनों से आंदोलन कर रहे लगभग 5000 से अधिक तदर्थ अध्यापकों के नियमित करने की बात को सरकार दबा गई और कोरोनावायरस के नाम पर उन लोगों के आंदोलन को दबा दिया। दिल्ली में बैठी केजरीवाल सरकार ने लॉकडाउन के नाम पर पिछले 5 महीने से सैकड़ों अध्यापकों की सैलरी पर कुंडली मारकर बैठ गया।

पूर्व दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन के अध्यक्ष आदित्य नारायण मिश्रा ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के 12 कॉलेज में दिल्ली सरकार द्वारा अनुदानित संस्थाओं में पिछले 5 महीनों से शिक्षकों को वेतन ना देना गैरकानूनी, अमानवीय और मानवाधिकारों का हनन है। दिल्ली प्रदेश युवा कांग्रेस रिसर्च विभाग के प्रभारी डॉ. अनिल कुमार मीणा ने बताया कि बीमारी से जूझ रहे कुछ अध्यापक समय पर धनाभाव में इलाज तक नहीं हो रहा है। शिक्षक और कर्मचारी मासिक किस्तें चुका पाने में असमर्थ हैं और बच्चों की फीस तक नहीं दे पा रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लुभावना प्रलोभन मुंह में राम बगल में छुरी जैसा है जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन उस की जमीनी हकीकत करोड़पतियों के हाथों शिक्षण संस्थानों को सौंपना है। देश के लोगों के पैसे से तैयार हुए संस्थानों को बीएसएनल, एयर इंडिया, रेलवे की तरह शिक्षा में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से उद्योगपतियों देना है, जिसका दुष्परिणाम आने वाले समय में आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों के लोगों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करना है। सरकार की मंशा शिक्षा को उद्योग के रूप में स्थापित करना है, जो देश के बहुसंख्यक वर्ग के लिए शिक्षा के दरवाजे तक जाना एक चुनौतीपूर्ण रास्ता होगा। ‘पेसा फेंक तमाशा देख’ जैसा हाल देश की शिक्षा व्यवस्था का हो जाएगा तथा जो लोग महंगी शिक्षा अपने बच्चों को देने में समर्थ है वह पैसा देकर भी शिक्षित करेगा, लेकिन जो व्यक्ति घर की दो वक्त की रोटी जुटाने में असमर्थ है, उन लोगों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग और NSIT हमारे विश्वविद्यालय से निकल चुके हैं। कल को मेडिकल कॉलेज भी इसी तरीके से हस्तांतरित हो सकते हैं। उधर वेंकटेश्वर कॉलेज को आंध्र विश्वविद्यालय से जोड़ने की कोशिश भी चल रही है। तो फिर बचेगा क्या? ट्रस्ट संचालित कॉलेज, जिन्हें ऑटोनोमस बनाने की मुहिम चल ही रही है। आज 11 मार्च से दिल्ली विश्वविद्यालय बिल्कुल शटडाउन है। करोना काल के कठिनतम परिस्थितियों में केजरीवाल सरकार का यह रवैया अमानवीय और असंवेदनशील तो है ही, इन कॉलेजों को अलग करने की साजिश भी है। वेतन और फंड रोकने के मुद्दे पर गंभीरता के साथ दिल्ली सरकार के विरोध में आंदोलन चल रहा है।

Related posts

Leave a Comment