अपनी संतानों को अलग-अलग संदेश नहीं भेजता परमात्मा (शिक्षा वाहिनी के वर्ष 14, अंक 23 में 30 दिसम्बर 2017 को प्रकाशित लेख का पुनःप्रकाशन)

डा. जगदीश गाँधी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब, किताबे अकदस आदि सभी पवित्र पुस्तकों में दी गई शिक्षाओं को भेजने वाला परमात्मा न तो हिन्दू है, न बौद्ध है, न मुस्लिम है, न सिख है, न ईसाई आदि, जबकि हम अज्ञानतावश यह समझते हैं कि गीता में दी गई शिक्षायें केवल हिन्दू धर्म को मानने वालों के लिए, त्रिपटक में दी गई शिक्षायें केवल बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए, कुरान में दी गई शिक्षायें केवल मुस्लिम धर्म को मानने वालों के लिए, गुरू ग्रंथ साहिब में दी गई शिक्षायें केवल सिख धर्म को मानने वालों के लिए, बाईबिल में दी गई शिक्षायें केवल ईसाई धर्म को मानने वालों के लिए तथा किताबे अकदस में दी गई शिक्षायें केवल बहाई धर्म को मानने वालों के लिए ही हैं।
सभी पवित्र पुस्तकों का ज्ञान परम पिता परमात्मा के दिव्य लोक से संसार की समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करने के लिए, समस्त मानव जाति की भलाई, सुख, समृद्धि, मानव मात्र की आपसी एकता, आपसी प्रेम एवं संसार में रहते हुए ही स्वर्ग की अनुभूति का मार्ग बताने के लिए आया हैं। इन सभी पवित्र ग्रंथों में सत्य, अहिंसा, दया, करूणा, न्याय, त्याग, मर्यादा, समता, भाईचारा, एकता, तन मन की सफाई, चरित्र का बल आदि गुणों को अपनाने की बात कहीं गयी है। परमात्मा कभी भी अपनी संतानों के बीच में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं चाहता, इसलिए उसकी सभी शिक्षायें किसी एक धर्म विशेष, जाति विशेष, भाषा विशेष एवं स्थान विशेष के लोगों के लिए न होकर सारी मानवजाति के लिए समान रूप से होती हैं।
सभी पवित्र पुस्तकों में दिया गया दिव्य ज्ञान परमात्मा ने युग-युग में मानवजाति की आवश्यकता के अनुसार संसार के विभिन्न स्थानों पर, स्थानीय भाषाओं में, उस युग के युगावतारों के माध्यम से भेजा हैं। कालान्तर में यही दिव्य ज्ञान संसार की विभिन्न भाषाओं में अनुवादित होकर सारे संसार में फैल गया। परमात्मा का कोई नाम नहीं हैं। विश्व के लोगों ने अपनी-अपनी भाषा में परमात्मा को ईश्वर, रब, खुदा, वाहे गुरू, गाॅड आदि अनेक नामों से पुकारने के साथ ही उनकी पूजा, इबादत, प्रेयर, पाठ करने के लिए अलग-अलग तरह की पूजा पद्धतियाँ तथा अलग-अलग तरह के पूजा स्थल जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारे आदि बना लिये हैं।
अलग-अलग पूजा स्थलों में जाकर अलग-अलग पद्धतियों से प्रार्थना करने के कारण ही संसार भर में यह अज्ञान फैल गया कि परमात्मा एक नहीं वरन् अनेक हैं। इन सभी अवतारों की पवित्र आत्मा परमपिता परमात्मा के दिव्य लोक से आई थी और उनके षरीर छोड़ने के बाद उसी दिव्य लोक को वापिस चली गई। इस प्रकार अवतारों का जन्म भी हुआ और इनकी मृत्यु भी हुई, जबकि परमपिता परमात्मा तो अजन्मा है। उसने न तो कभी जन्म लिया है और न ही उसकी कभी मृत्यु ही होती है। परमात्मा तो अजर, अमर एवं अविनाशी है। इस प्रकार राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि सभी अवतारों के परमात्मा न तो अलग-अलग थे और न ही हमारा परमात्मा ही अलग-अलग है। इन सभी अवतारों के साथ ही साथ हमारी आत्मा का पिता परमपिता परमात्मा भी एक ही है।
हम प्रार्थना मंदिर, मस्जिद, गिरजा तथा गुरूद्वारे आदि कहीं भी करें उसको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। हम प्रार्थना हिन्दी में करें या अंग्रेजी में, उर्दू में करें या पंजाबी में या दुनियाँ की किसी भी अन्य भाषा में करें उसे सुनने वाला परमपिता परमात्मा एक ही है। मंगलमय वह जगह जहाँ प्रभु महिमा गायी जाती है तथा जहाँ परमेश्वर की चर्चा होती वही स्थान मंगलमय है। हे ईश्वर, मैं तुझे जाँनू तथा तेरी पूजा करूँ। मनुष्य का सदैव से एक ही धर्म (कर्तव्य) रहा है – प्रभु इच्छाओं को जानना तथा उन पर चलना। प्रभु की शिक्षाओं को पवित्र किताबों में जाकर जानना तथा उसके अनुसार संसार में रहकर पवित्र भावना से प्रभु का कार्य करना ही हर प्राणी का धर्म है। प्रभु की इच्छाओं को जानकर तथा उसके अनुसार कार्य करने के अलावा प्राणी का कोई दूसरा धर्म नहीं है।
विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे पढ़ने तथा टीचर्स पढ़ाने आते हैं। इसलिए विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-धाम, क्लास रूम शिक्षा का मंदिर बच्चे देव समान। घर-विद्यालय ऐसा हो जिसमें हो चरित्र निर्माण और अपनेे बच्चों को दे सब धर्मो का ज्ञान! क्योंकि घर और विद्यालय से बढ़कर कोई न तीरथ-धाम! स्कूलों में रोजाना पढ़ाई एवं समय-समय पर आयोजित होने वाले षैक्षिक कार्यक्रमों की षुरूआत सर्व-धर्म प्रार्थना से ही होनी चाहिए इसके साथ ही समाज के लोग भी इसका अनुसरण करके बच्चों के समक्ष एक आदर्श रखे। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हमारे घरों में सभी धर्माें की पवित्र पुस्तकंे हों तथा एक ही परमात्मा की ओर से युग-युग में भेजी गई इन पवित्र पुस्तकों में समय-समय पर जो ज्ञान हम पृथ्वीवासियों के लिए परमात्मा ने प्रगतिशील श्रृंखला के अन्तर्गत सिलसिलेवार भेजा है, उन सभी ईश्वरीय ज्ञान के प्रति बच्चों में बाल्यावस्था से ही श्रद्धा एवं सम्मान की भावना पैदा करें।
बच्चों को परिवारजन, स्कूल के टीचर्स तथा समाज के लोग बताये कि परमात्मा एक है, सभी धर्म एक है तथा सारी मानव जाति उसी एक परमात्मा की संतान है। हमें पूर्ण विश्वास है कि स्कूल, परिवार और समाज के संयुक्त प्रयास से परमात्मा को, धर्म को तथा पवित्र पुस्तकों के माध्यम से भेजे दिव्य ज्ञान को अलग-अलग समझने का अज्ञान धीरे-धीरे समाप्त होगा।
हमें यह सच्चाई अपने बच्चों को बतानी चाहिए कि हम सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं और जब से इस सष्ष्टि का निर्माण हुआ हैं, तब से लेकर आज तक एक ही परमपिता परमात्मा ने युग-युग में अपने दिव्य लोक से गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस आदि पवित्र पुस्तकों को मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए ही भेजा है। जब-जब ईश्वरीय शिक्षाओं को जानकर उन शिक्षाओं पर चलने वाले लोगों की संख्या में कमी आती जाती है, तब-तब मानव मात्र को अज्ञान तथा दुखों से छुटकारा दिलाने के लिए परमात्मा कष्पा करके एक अति पवित्र आत्मा का चुनाव करता है। परमात्मा ने इसके लिए युग-युग में राम, कष्श्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक, महावीर, अब्राहम, मोजज, जोरास्टर, बहाउल्लाह आदि अवतारों का चुनाव किया तथा इन्हीं पवित्र एवं दिव्य आत्माओं को अपनी दिव्य योजना तथा रहस्य उद्घाटित किया।
परमात्मा आगे भी युग-युग की आवश्यकता के अनुसार युगों-युगों तक अपना दिव्य ज्ञान किसी न किसी अवतार के माध्यम से सारी मानवजाति की भलाई तथा उनके दुखों को दूर करने के लिए भेजता रहेगा। इसलिए हमें परमात्मा की दिव्य योजना के अन्तर्गत अवतरित किसी भी अवतार को तथा उनकी शिक्षाओं को कम करके नहीं आंकना चाहिए। जिन अज्ञानियों ने हर युग में परमात्मा द्वारा अवतरित अपने युग के युगावतार का अपने अहंकार तथा संशयवष्त्ति के कारण विरोध किया उन्होंने अपने षरीर के साथ ही साथ अपनी आत्मा का भी विनाश कर लिया। युगावतार की इच्छा और आज्ञा को पहचानने के मायने है परमात्मा की इच्छा और आज्ञा को पहचान लेना।
हमें शरीर के सभी अंग जैसे आंख, कान, वाणी, मस्तिष्क, हाथ, पैर आदि इसलिए मिले हैं कि हम अपने इन अंगों के सहयोग से पूरे उत्साह से परमात्मा का कार्य करें। हमारा शरीर एक यंत्र मात्र है। उदाहरण के लिए जब हम किसी शहर में घूमने जाते हैं तो घूमने के लिए वहाँ साईकिल या कोई अन्य वाहन किराये पर लेते है। इसी प्रकार परमात्मा ने संसार में प्रभु का कार्य करने के लिए यह शरीर रूपी साईकिल फ्री ऑफ़ चार्ज दी है। आत्मा इस षरीर रूपी साईकिल का सवार है। यह शरीर हमें ईश्वरीय आज्ञाओं के पालन के लिए मिला हुआ है। परमात्मा कहता है कि तेरा शरीर मेरे काम के लिए है और मेरा कार्य है सारी मानवजाति का कल्याण। अतः तू अपने इस शरीर का उपयोग सारी मानवजाति की भलाई के लिए करना।
परमात्मा कहता है कि हे प्राणी तुम्हें जो मैंने आँखें दी हैं, वो ईश्वरीय महिमा का दर्शन करने के लिए दी है। इसलिए व्यर्थ की चीजें को हम अपनी इन आँखों से न देखे। ईश्वर कहता है कि तेरी आँखें मेरा भरोसा है। तू इसको व्यर्थ की इच्छाओं से धूमिल न कर। तेरे कान मैंने तुझे अपनी पवित्र वाणी को सुनने के लिए दिये हैं। इन कानों से तू मेरी आज्ञा एवं इच्छाओं के विपरीत कोई बात न सुने। तेरा हृदय मेरे गुणों का खजाना है। तेरे स्वार्थरुपी हाथ कही मेरे गुणों रूपी खजाने को लूट न लें। मैंने तुझे जो हाथ दिये हैं वो इसलिए कि तेरे हाथों में मेरी ज्ञान की पुस्तकें हों। इन हाथों से तू उन्ही कामों को कर जो मैंने गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रंथ साहिब, किताबे अकदस आदि सभी पवित्र पुस्तकों में दी हैं।
पवित्र गीता में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘न्याय’’ पर आधारित हैं। सभी संसारवासियों को न्यायप्रिय होना चाहिए। पवित्र त्रिपटक में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं, लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘सम्यक ज्ञान (समता)’’ पर आधारित हैं। इसलिए संसार में जाति-पाति, गोरे-काले तथा ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी को आपस में भेदभावरहित होकर तथा मिल-जुलकर रहना चाहिए। पवित्र बाईबिल में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘करूणा’’ पर आधारित हैं। अतः सभी विश्ववासियों में एक-दूसरे के प्रति करूणा हो।
पवित्र कुरान में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘भाईचारे’’ पर आधारित हैं। अतः सभी विश्ववासियों में आपस में भाईचारा हो। पवित्र गुरू ग्रन्थ साहिब में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं, लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘त्याग’’ पर आधारित हैं। इसलिए सभी को एक-दूसरे की खुशहाली के लिए त्याग करना चाहिए। किताबे अकदस में वैसे तो हजारों प्रेरणादायी शिक्षायें हैं लेकिन सभी मुख्य रूप से ‘‘हष्दय की एकता’’ पर आधारित हैं। अतः सभी विश्ववासियों के हष्दय मिलकर एक हो जायें तो सारे विश्व में एकता तथा षान्ति स्थापित हो जायेगी।
यदि बालक को भौतिक तथा सामाजिक शिक्षा के साथ ही दिव्य लोक से परमात्मा द्वारा भेजी गई शिक्षाओं जैसे न्याय, सम्यक ज्ञान, करूणा, भाईचारा, त्याग तथा हष्दय की एकता से जोड़ दें तो हमारा बालक टोटल क्वालिटी पर्सन (टीक्यूपी) बन जायेगा। यदि हम अपने बालक का दष्ष्टिकोण धर्म के मामले में संकुचित बना दें तो किसी के जरा सा उकसाने पर वह जाति-धर्म के नाम पर आपस में एक-दूसरे से लड़ेगा, जबकि सारे विश्व की समस्त मानवजाति का परमात्मा एक ही है और सारी मानवजाति एक ही खुदा या परमात्मा की संतानें हैं। युग-युग में आये सभी अवतारों राम, कष्श्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक, महावीर, मोजज, अब्राहम, जोरास्टर, बहाउल्लाह के अंदर जो आत्म-तत्व था वह एक ही परमात्मा का था। अवतारों के षरीर छोड़ने के बाद उनकी आत्मा उसी एक परमात्मा में जाकर मिल गयी। इसी प्रकार हमारे अंदर एक परमात्मा की ही आत्मा है।
संसार में रहते हुए बुरे कार्यों में लिप्त अविकसित आत्मा उस मनुष्य के जीवित रहते हुए तथा षरीर छोड़ने के बाद प्रभु मिलन के अभाव मेें अनन्त काल तक विलाप करती हैं, जबकि संसार में रहते हुए अच्छे कार्यो द्वारा विकसित हुई आत्मा उस मनुष्य के जीवित रहते हुए तथा षरीर छोड़ने के बाद दिव्य लोक में परमात्मा से मिलन का परम आनन्द प्राप्त करती है। इसलिए हमें अपने षरीर रूपी यंत्र के माध्यम से परमात्मा की शिक्षाओं को पवित्र ग्रन्थों से जानकर उन शिक्षाओं पर चलते हुए अपनी आत्मा का विकास करना चाहिए, जो कोई प्रभु की ‘इच्छा’ तथा ‘आज्ञा’ को पहचान लेगा उसे धरती तथा आकाश की कोई भी शक्ति ‘प्रभु का कार्य’ करने से रोक नहीं सकती।

संस्थापक-प्रबन्धक सिटी मोन्टेसरी स्कूल लखनऊ, उत्तर प्रदेश 

 

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