शिवपुराण से……. (282) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

नारदजी के प्रश्न और ब्रह्माजी के द्वारा उनका उत्तर, सदाशिव से त्रिदेवों की उत्पत्ति तथा ब्रह्माजी से देवता आदि की सृष्टि के पश्चात एक नारी और एक पुरूष का प्राकट्य……………….

गतांक से आगे………..

वह मूर्तिमती सायं-संध्या ही थी और निरन्तर किसी मंत्र का जाप करती रहती थी। सुन्दर भौंहों वाली वह नारी सौन्दर्य की चरम सीमा को पहुंची थी और मुनियों के भी मन को मोह लेती थी। इसी तरह मेरे मन से एक मनोहर पुरूष भी प्रकट हुआ, जो अन्यन्त अद्भुत था। उसके शरीर का मध्यभाग (कटि प्रदेश) पतला था। दांतों की पंक्तियां बड़ी सुन्दर थीं। उसके अंगों से मतवाले हाथी की सी गन्ध प्रकट होती थी। नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान शोभा पाते थे। अंगों में केसर लगा था, जिसकी सुगन्ध नासिका को तृप्त कर रही थी। उस पुरूष को देखकर दक्ष आदि मेरे सभी पुत्र अत्यन्त उत्सुक हो उठे। उनके मन में विस्मय भर गया था। जगत् की सृष्टि करने वाले मुझ जगदीश्वर ब्रह्मा की ओर देखकर उस पुरूष ने विनय से गर्दन झुका दी और मुझे प्रणाम करके कहा-वह पुरूष बोला- ब्रह्मन्! मैं कौन सा कार्य करूंगा? मेरे योग्य जो काम हो, उसमें मुझे लगाइये, क्योंकि विधाता! आज आप ही सबसे अधिक माननीय और योग्य पुरूष हैं। यह लोक आपसे ही शोभित हो रहा है। ब्रह्माजी ने कहा-भद्रपुरूष! तुम अपने इसी स्वरूप से तथा फूल के बने हुए पांच बाणों से स्त्रियों और पुरूषों को मोहित करते हुए सृष्टि के सनातन कार्य को चलाओ।

(शेष आगामी अंक में)

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