सतलुज घाटी में महाशिरात्रि महापर्व परम्परा (महाशिवरात्रि पर विशेष)

डा.हिमेन्द्र “बाली”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

शिवरात्रि महापर्व का आयोजन हिमाचल प्रदेश की सतलुज घाटी में पारम्परिक रीति से होता है। वास्तव में कैलाश पर्वत पर शिव का निवास है और यह पर्वत श्रृंग पर्वत राज हिमालय में अवस्थित है। शिव हिमालय के जामाता हैं, इसलिए पर्वतीय परिवेश में शिव सबसे लोकप्रिय देव हैं। सतलुज घाटी में शैव मत की प्रधानता है। किन्नौर बुशैहर मैं किन्नर कैलाश को शिव का आवास माना जाता है। कुल्लू व शिमला की सीमा पर 18000 फुट की ऊंच्चाई पर श्रीखण्ड को शिव के पार्थिव विग्रह रूप में पूजन की मान्यता है। निरमण्ड में दक्षिणेश्वर महादेव, नीत्थर में बूढ़ा महादेव, आनी में शमशरी महादेव, कुमारसैन में कोटेश्वर महादेव, केपू में धनेश्वर महादेव, सुकेत-मण्डी में तेबनी महादेव, बैहना में बैहनी महादेव, पंदोआ में पंदोई महादेव व करसोग में ममलेश्वर महादेव सतलुज घाटी में प्रमुख महादेव के पुण्य स्थल है। यहां अन्य देव समुदाय भी शिव रूप या शिव के अधीनस्थ देव समुदाय से सम्बंधित हैं। अत: पश्चिम हिमालय का यह क्षेत्र शिवमय है। महाशिवरात्रि का महोत्सव यहां बड़े हर्षोल्लास व पारम्परिक रीति से मनाने का विधान है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन शिव व पार्वती का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ था। एक अन्य पौराणिक आख्यान के अनुसार इसी दिन शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इसी दिन शिव ने सागर मंथन से निकले कालकूट विष का पान किया था। इस पूर्ण रात्रि को देवताओं ने अचेतन शिव के शीघ्र स्वस्थ होने के लिए पूजा अर्चना की। शिव जब चेतनावस्था में आए तो उन्होने कहा कि जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को रात्रि जागरण कर मेरे निमित्त उपवास करेगा, उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी। तभी से शिव को समर्पित  महोत्सव मनाने की यह परम्परा आरम्भ हुई।


सतलुज घाटी के अंतर्गत शिमला जिले के पूर्ववर्ती सांगरी रियासत की राजधानी बड़ागांव में महाशिवरात्रि से एक महीने पूर्व महादेव शिव व पार्वती की सगाई के रूप में छोटी शिवरात्रि का आयोजन होता है। इस दिन या इससे कुछ दिन पूर्व बड़ागांव के देव शिरोमणि ब्रह्मेश्वर देवता से लोगों द्वारा भक्ति गीत आंचली या जती या छैड़ी के गायन की अनुमति ली जाती है। बड़ागांव लोक कलाकार पीसी भारद्वाज का कहना है कि देवाज्ञा के बाद हर रोज देवता की कोठी में मध्य रात्रि तक देव गीत “ब्रह्म अखाड़ा”का भाव पूर्ण गायन किया जाता है।  ब्रह्म अखाड़ा गायन का यह सिलसिला पूरे महीने चलता रहता है। पीसी भारद्वाज कहते हैं कि मंदिर में इस दौरान लौकिक गीत नहीं गाए जाते हैं। वास्तव में जती, छैड़ी और आंचली की अंतर्वस्तु लौकिक होती है, जिसका गायन देवस्थल पर वर्जित माना जाता है। बड़ागांव में आज भी गांव में ब्रह्मेश्वर देवता के मंदिर के पृष्ठभाग में जो घर-परिवार हैं, वहां लौकिक शिवरात्रि गीत जती या आंचली का गायन वर्जित है।
सतलुज घाटी में महाशिवरात्रि महापर्व तीन दिवसीय आयोजन है। फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को जहां शिवरात्रि का आयोजन होता है, जिसे “पूजणी” कहते हैं। पूजणी से दो दिन पूर्व शिवरात्रि का आरम्भ होता है, जिसे कुमारसैन-सांगरी व निरमण्ड-आनी में चैवका और मण्डी के सुकेत क्षेत्र में चैगिया कहते हैं। इस दिन शिव मंडप को गोमूत्र से आलेपित कर संध्याकाल में जौ व पाजा पौधे की शाखाएं रखकर पूजा की जाती है। अगले दिवस शिवरात्रि से एक दिन पूर्व “ददूण” पर्व से शिव पूजा का वास्तविक आगाज होता है। सांगरी में सभी घरों से एक-एक सदस्य आटा, घी व गुड़ का भोग लेकर ब्रह्म मुहूर्त में सांगरी के गढ़ पति देव थान देवता या थानेश्वर के शिवान में स्थित गृह मंदिर भरमोल नामक स्थान पर जाते हैं। सभी लोग भोग को थान देवता के प्रतिनिधि व छड़ी बरदार ठाकुर के माध्यम से देवता को अर्पित करते हैं। यहां थान देवता आम जनता के लिए दर्शनार्थ सुलभ नहीं हैं, जबकि थान देवता पूरे सांगरी क्षेत्र व ठकुराई के एकछत्र देवाधिपति हैं। सांगरी में कोई भी पारिवारिक कार्य का शुभारम्भ थान देवता की अनुमति के बगैर नहीं होता। थान देवता को भोग चढ़ाने के साथ ही शिवरात्रि का आरम्भ देवाज्ञा से माना जाता है। परिवार की महिला उपवास धारण कर तैलीय पकवान पकैन, भल्ले सणसे व माल पुड़े बनातीं हैं। संध्या बेला में मंडप में शिव व उनके परिवार को स्थापित कर महादेव की आटे की बड़े आकार की रोटी विग्रह रूप में बनाकर प्रतिष्ठित की जाती है। शिव को बलि रूप में आटे के बकरे व मेंडे बनाकर मण्डप में रखे जाते हैं। मंडप में घर में रखे हथियार कटार या तेज धार औजार भी रखे जाते हैं। शिव पूजा के बाद शिवांचली का गायन कर भगवान को श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं।
कुमारसैन रियासत के क्षेत्र में भी ददूण के दिन परिवार के सदस्य भोग लेकर कुलदेव से शिवरात्रि महापर्व को आरम्भ करने की अनुमति लेते हैं। तदोपरांत घर में वह महिला तैलीय पकवान बनाने का दायित्व सम्भालती है, जिसका “नरोड़” खुला हो। नरोड़ खोलने से अभिप्राय है कि जिस गृह वधु के मायके वाले बकरे को कोटेश्वर देवता के साथ प्रतिष्ठित बूढ़ा महादेव को अर्पित करते हैं तो उस गृह वधु का नरोड़ खुल जाता है। उस वधु को शिवरात्रि पर्व पर तैलीय पकवान बनाने व महादेव को अर्पित करने की पात्रता प्राप्त होती है। ददूण के दिन कुमारसैन में पकवान बनाकर नरोल वाले कक्ष में मंडप पर शिव को अर्पित किया जाता है। नरोल से अभिप्राय बूढ़ा महादेव की दैवीय  सत्ता से है। बूढ़ा महादेव कुमारसैन के पारिवारिक अधिराज्य के अधिपति हैं, जबकि केदारेश्वर कोटेश्वर महादेव बाहर का राज्य संचालित करते हैं। बूढ़ा महादेव की सभी सांस्कारिक क्रियाएं पर्दे अर्थात् नरोड़ में होती है। मंडप में अनाज की ढेरी पर खट्टा फल कैमटू रख कर शिव को प्रतिष्ठित किया जाता है और परसा हथियार भी अनाज की ढेरी पर रखकर पूजा जाता है। पूजणी पर घर का पुरूष उपवास रखकर भांग के रेशे से बनी पतली रस्सी में खट्टा फल कैमटू को जौ, तुलसी व गलदाऊदी के पुष्पों के साथ गूंथकर पच्चीस-तीस दानों की एक लड़ी बनाता है, जिसे शिव विग्रह रूप माना जाता है।


शिव का लड़ीनुमा विग्रह को चदो कहते हैं। चदो को बनाते हुए गीत गाए जाते हैं-
कैम्पा कुलौ ला बैशौ द्वारे….
सैंई आओ ला पाऊंणा म्हारै…
सैंई आव ला सांझ की बेला….
करा लोगुओ सैंई आगे खेला….
मंडप को संध्या तक गोबर से आलेपित कर आटे से अष्टकोण व त्रिकोण बनाकर सुन्दर स्वरूप प्रदान किया जाता है। चदो को लम्बरूप में बांध कर मंडप के मध्य में अनाज की ढेरी पर अवलम्बित किया जाता है। मंडप में नाना प्रकार के तैलीय पकवान, आटे के बकरेव मेंडे शिव को अर्पित किए जाते हैं। घर की महिलाएं अपने आभूषणों से शिव रूप चदो को सुसज्जित करतीं हैं। हिमाचल में महादेव को सैंई कहकर सम्बोधित किया जाता है। वे भक्तों के घर आकर बकरे व मेंडे खाने आते हैं, जो भक्त उन्हे अर्पित करते हैं। भक्तिमय गीतों का सिलसिला पूजणी के दिन रात्रि पर्यन्त चलता रहता हैं। ब्रह्म मुहूर्त में लड़ीनुमा शिव विग्रह चदो को उपवास धारक व्यक्ति गले में धारण कर भावुक विदाई गीत के साथ मंडप से निकालता है। चदो को उठाकर कर बरामदे में उंच्चस्थ स्थान पर वर्ष पर्यंत रखा जाता है। लोगों की शिव के विदा होने की विरह वेदना असहनीय हो जाती है। लोग अपने सैंई को अश्रुपूर्ण विदाई गीत के माध्यम से विदा करते हैं-
ओडू का बाशादी शैरी…औडू का बाशादी शैरी…
सैंई लागी जाणा री तैरी….सैंई लागी जाणा री तैरी..
हाथै चौकै सोने री शोठी…सैंई हाथै चौकै सोने री शौठे…
सुलै डेयै सैंई तू बांटै न लोटे…..
अर्थात् साथ लगते कहीं खेत में मैना बोल रही है कि सैंई अब जाने की तैयारी कर रहै हैं। हे सैंई! तुम हाथ में सोने की लाठी लेना, ताकि तुम रास्ते में न गिरो। शिव के प्रति ऐसी आत्मीयता आस्था की पराकाष्ठा की प्रतीक है। वास्तव में महाशिवरात्रि का महापर्व लोगों का अपने प्रियतम् इष्ट के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
इतिहासकार व साहित्यकार नारकण्डा (शिमला) हिमाचल प्रदेश 

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