शिवपुराण से……. (281) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता, द्वितीय (सती) खण्ड

नारदजी के प्रश्न और ब्रह्माजी के द्वारा उनका उत्तर, सदाशिव से त्रिदेवों की उत्पत्ति तथा ब्रह्माजी से देवता आदि की सृष्टि के पश्चात एक नारी और एक पुरूष का प्राकट्य……………….

गतांक से आगे………..

फिर वे ही प्रभु सगुण और शक्तिमान होकर विशिष्ट रूप धारण करके स्थित हुए। उनके साथ भगवती उमा विराजमान थीं। विप्रवर! वे भगवान शिव दिव्य आकृति से सुशोभित हो रहे थे। उनके मन में कोई विकार नहीं था। वे अपने परात्पर रूप में प्रतिष्ठित थे। मुनिश्रेष्ठ! उनके बायें अंग से भगवान् विष्णु, दायें अंग से मैं ब्रह्मा और मध्य अंग अर्थात हृदय से रूद्रदेव प्रकट हुए। मैं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हुआ, भगवान् विष्णु जगत का पालन करने लगे और स्वयं रूद्र ने संहार का कार्य संभाला। इस प्रकार भगवान! सदाशिव स्वयं ही तीन रूप धारण करके स्थित हुए। उन्हीं की आराधना करके मुझ लोकपितामह ब्रह्मा ने देवता, असुर और मनुष्य आदि सम्पूर्ण जीवों की सृष्टि की। दक्ष आदि प्रजापतियों और देव शिरोमणियों की सृष्टि करके मैं बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपने को सबसे अधिक ऊंचा मानने लगा। मुने! जब मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष और भ्रगु-इन महान प्रभावशाली मानसपुत्रों को मैंने उत्पन्न किया, तब मेरे हृदय से अत्यन्त मनोहर रूप वाली एक सुन्दरी नारी उत्पन्न हुई, जिसका नाम संध्या था। वह दिन मंे क्षीण हो जाती, परन्तु सायंकाल में उसका रूप-सौंदय खिल उठता था।

(शेष आगामी अंक में)

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