लाचित बरफुकन के देशभक्ति

डाॅ. वाणी बरठाकुर ‘विभा’ शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बात हैं सन् सोलह सौ सत्तावन की ,
मुगल सेनापति रामसिंह ने
हमला बोला था असम पर
लेकर अनगिनत सेनानी साथ ।
नहीं पीछे थे लाचित बरफुकन
जो थे वीर, देशप्रेमी
आहोम के सेनापति ।
कम सेनानी लेकर
कैसे रोक सकेंगे शत्रु को ,
रण कौशल जानते थे वो
रातों-रात गड़ बनेंगे
शत्रु आ सकें न आसानी से
सभी मज़दूरों को लगा दिया
मिट्टी खोदें गड़  बनाएँ ।
देख रेख करने हेतु
भार सौंपा मामा मोमाई तामुली को।
आधी रात लाचित आए
देखा मामा के साथ साथ
मजदूर भी सोये हैं ।
वो अब हुए चिंता में चकनाचूर
कैसे भगाये शत्रु को दूर ।
हाथ में उठाया तलवार
अपने ही मामा का
सिर किया शरीर से अलग ।
कहने लगा…..
‘देश से मामा बड़ा नही है’।
यह देखकर मजदूर काँप उठे
रातोंरात गड़  बंधे ।
सुबह निकला लाचित बरफुकन
ब्रह्मपुत्र पर नाव लेकर
तप रहा था शरीर बुखार से
फिर भी युद्ध हेतु आगे बढ़ा
गड़ लाँघने वालों को
एक एक कर मार गिराया ।
 मुगलों के सेनापति डर गए
अपनी सेना को लेकर भागे।
ऐसे ही वीर लाचित बरफूकन ने
मुगलों को हराकर असम को बचाया ।
लाचित जैसे वीर के आदर्श को
अपने दिल में प्रतिष्ठित करो,
देश को रक्षा करने हेतु
जान न्योछावर करके
देशभक्ति में लीन हो ।
तल गेरेकी,  तेजपुर (शोणितपुर) असम

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