रेणुः एक विरल वनस्पति

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

लोक और ग्रामीण जीवन को साहित्य से जोड़ने वाले महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ “रेणु” जीवित होते तो 4 मार्च 2021 को 100 बरस के हो जाते। उनके साहित्य में पशु, पक्षी, पेड़, पौधों, मिट्टी, फसलों, कई-कई भाषाओं और मनुष्य के अनेकानेक रूप समाहित हैं कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। फणीश्वर नाथ रेणु की जीवनी विविधाओं और जीवन कठिन राहों पर चलने में अभ्यस्त था। आज भी साहित्य के प्रेमी उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं तथा प्रसंगों को याद करते रहते हैं। वह बहुत कम उम्र से ही नाटक, अभिनय, गायन, वादन से जुड़े हुए थे। कहीं भी ऐसा अवसर आए तो वे उसका उपयोग करने में वह नहीं चूकते थे। जगह-जगह जहां भी सीख मिलती थी, वे उसे अपने मन की है गांठ में बांध लेते थे।  उनका मन कक्षा के बंधे बंधाए पाठ में नहीं रमता था। वह जीवन की विभिन्न अवसरों को अपने अनुभव में बदलते रहते थे। मैला आंचल का मेरीगंज भारत के एक पिछडे़ गांव का प्रतीक है। बावजूद इसके वह भरा पूरा सतत आंदोलित, जीते जागते  विचित्र स्वभाव और स्वरूप के लोगों से निर्मित गांव हैं। गाँव के पिछडेधपन का कारण गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा है।
फणीश्वर नाथ “रेणु” की रचनाशीलता में ज्ञान के इतने विविध विषय और रूप समाहित हैं कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। वे संगीत, चित्रकला और कविता के वह मर्मज्ञ थे। मैला आंचल में एक ऐसे साधक को देखकर सहसा आश्चर्य होता है। फणीश्वर नाथ “रेणु” विरल वनस्पतिओं की खोज में लगे रहते थे। उनके पिताजी और दो छोटे भाई मलेरिया से काल कवलित हो चुके थे। उन्होंने पाइरिथ्रम नामक पौधे, दुर्लभ वनस्पति की खोज की, इसकी सुगंध से मच्छर-कीट-पतंग दूर भागते हैं। फणीश्वर नाथ “रेणु” ने इस खोज के बाद विदेश से बहुत मुश्किल से एक पौधा मंगवा कर अपने घर में लगा था। उसके बाद उनके घर में मलेरिया से किसी की जान नहीं गई। विरह की खोज में लगे रहने वाले बंगाली डॉक्टर राय चौधरी को उन्होंने सुझाव दिया था कि इस पौधे को वराह क्षेत्र में बहुतायत में लगाए जाए तो कोसी के जल में उसके फूल-पत्तियों के घुल-मिल जाने पर पूरे अंचल से मलेरिया का प्रकोप दूर हो जाएगा। डॉ चौधरी ने क्षेत्र में यह प्रयोग किया और सफल रहा। मैला आंचल के प्रकाशन के बाद फणीश्वर नाथ “रेणु” ने घर के सामने अनेक दुर्लभ पौधे को खोज कर लगाए थे। अपने इलाके की बंजर जमीन पर पेंड़ लगाने सपना लेकर, उन्होंने, परती परिकथा में उन्होंने अपने छोटे भाई को इन शब्दों को समर्पित किया-भैया महेंद्र! तुम नहीं रहे, तुम्हारी कल्पना साकार हुई। सिमराहा की सपाट धरती पर हजारों पेड़ लग गये हैं भैय्या। महेन्द्र फणीश्वर नाथ “रेणु” के छोटे भाई थे, वह भी रेणु जी की तरह ही कुशग्रबुद्धि और प्रतिभाशाली थे, जो 1950 में स्वर्गसिधार गये थे।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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