सुकेती उपबोली का साहित्यिक व सांस्कृतिक अवलोकन

डा हिमेन्द्र बाली ” हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सुकेत पूर्ववर्ती सुकेत रियासत का ऐसा भौगोलिक व सांस्कृतिक स्वरूप है, जिसका अधिकत्तर क्षेत्र सतलुज घाटी में अवस्थित है। यहां बोली जाने वाली सुकेती उपबोली को दो भागों में बांटा जा सकता है। सुकेत का उत्तरी भाग जो ब्यास घाटी में है और दूसरा भाग जो सतलुज घाटी में है। वास्तव में सुकेती मण्डयाली बोली की ही शाखा है। मण्डयाली का जन्म 11वीं शताब्दी में शौरसैनी अपभ्रंश से हुआ। सकेती उपबोली में प्रचुर मात्रा में लोक साहित्य बिखरा पड़ा है। सुकेती उपबोली का प्रचलन लोक में आज भी बहुलता में व्यवहृत है। जब भाषा व बोली का प्रयोग जीवंत रहता है, तभी लोक साहित्य फलता फूलता है, परन्तु लोक साहित्य में आज के आधुनिकवादी सोच में सृजनधर्मिता विस्तार नहीं पा रही है। बहरहाल बीसवीं शताब्दी के अस्सी के दशक तक टीवी क्रांति से पहले सुकेत के लोक साहित्य में निरन्तरता और गतिशीलता थी। उस कालावधि तक सुकेती उपबोली में विपुल साहित्य का भण्डार देखने को मिलता है, उसके बाद उपग्रह युग में यहां के लोकसाहित्य के जैसे पहिए थम से गए। यही स्थिति कमोबेश हिमाचल की हर बोली उपबोली में देखने को मिलती है। लोक साहित्य में ठहराव की स्थिति लोक संस्कृति और परम्पराओं के प्रति उदासीनता का परिणाम है। लोक साहित्य में वाचिक परम्परा का अवसान और लोक परम्पराओं का विस्मरण मुख्य उत्तरदायी कारण हैं।
सुकेत में सुकेती उपबोली में उपलब्ध लोकसाहित्य आज भी मार्गदर्शक व प्रेरणादीप के रूप में लोक को जीने की कला सिखा रहा है। सुकेती उपबोली का प्रकीर्ण साहित्य-कहावतें, पोलहणियां, विचार व ढकोसलों के रूप में उपलब्ध है। कहावतें यहां के लोक के अनुभव की अक्षुण सम्पदा हैं, जो हमें सतर्क और सजग बनाती हैं- भाता री ता एकहे भतकोली परखणी हुआईं…. अर्थात् किसी की पहचान के लिए छोटी सी परीक्षा भी काफी है। एक अन्य कहावत-जुंआ रे कठ्ठे खिंदा की फकणी अर्थात् छोटी सी समस्या के निवारण के लिए बड़ा नुकसान नहीं करना चाहिए। यहां प्रचलित पोलहणियां दिमागी कसरत का सम्भल रहीं हैं- सौ दातरू एक गातरू अर्थात् चरवाहा। यहां के नीति वाक्य जैसे दूरी हांडणी पर बुरी नीं हांडणी अर्थात् जोखिम भरे रास्ते से लम्बा रास्ता सही रहता है। ढकोसले प्रहसन का माध्यम रहै हैं जैसे- ममेला रा  सुतीरा चुरागे आई जागा….चलते हुए ममेल में सोये व्यक्ति को चुराग पहुंचकर जाग आई। सकेत में विवाह में दुल्हा के बरातियों पर कटाक्षपूर्ण गीत जौंके गाने की परम्परा रही है- भात परीहा दाल परी है और परी है पीछ, ये ताया खांदा जे बैठेया जेहड़ा जंगले दा रीछ.. सुकेत में विवाह पर दुल्हा पक्ष के खाना खाने के आरम्भ में भात बांधने के लम्बे पद गाने की परम्परा है। भात (खाना) तभी खाया जाता है, यदि दुल्हा पक्ष का कोई व्यक्ति भात खोलने के पद गा कर सुनाये-पापी लोके भात बन्या धर्मिये दित्ता खोली, नेहल फुल्ली काथी-पोथी फाड़ फुल्लै बान बुराह, करा बै लोको अन्न ग्राह..सुकेत में लोकगीत और लोक कथा व लोक गाथाओं की अपार परम्परा रही है। सुकेत में देवगीत, विवाहगीत, संस्कारगीत, शोकगीत, लौक गीत, श्रमगीत, झूरी व बालू गाने बहुसंख्या में प्रचलित हैं। लोक गीतों मे संस्कार गीत, ऋतु व त्योहार गीत, छिंज गीत, छिंजोटियां, गुग्गा गीत, मालगीत, लोहड़ी गीत, दिवाली गीत, फाग गीत, शिवरात्रि गीत, बारह मासा, छ: मासा और बांठडा़ गीत प्रमुख हैं। यहां लोहड़ी से पूर्व बच्चे घर-घर जाकर लौहड़ी गाते हैं- धन्तरीया धन्तारा जोगी रा मुंह काला,जोगी रे चारो पखे धन्तारा..
सुकेत के लोकगीतों में यहां के मानस, समाज और इतिहास की तात्कालिक स्थिति का पता चलता है। प्रसिद्ध लाड़ी सरजू की नाटी सुकेत के इतिहास को भी उजागर करती है। ऐसी मान्यता है कि लाड़ी सरजू का रूप-लावण्य और उसका तंत्र विशारद होना उसे सुकेत के राजा को भा गया। कहते है कि राजा ने नौ गढ़ों के एवज में मण्डी के राजा से सरजू को प्राप्त  किया। सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा, जिसकी इस गीत में वर्णन है, यहां आज भी राजा के महल तक साठ सीढ़ियां हैं-
लाड़ी सरजुऐ शाठ बोलौ पौड़ी रा संवाणा पांगणे बेड़े दे,
लाड़ी सरजुऐ नवा बोलौ सुटड़ो लाणा माहूंनागै मेड़ै दे…
सुकेत  में प्रचलित लोक कथाएं कभी सर्दी की लम्बी रातों में सुनाने की परम्परा रही है। लोक कथाओं में गेय कथाएं रमैण व पाण्डवायण प्रमुख थीं। कई लौकिक कथायें-टुण्डी राक्स, विधिमाता, सत्यवादी राजा हरिश्चद्र प्रमुख रहीं हैं। ऐतिहासिक कथाओं में माहूंनाग-राजा श्यामसेन, राणा सनारलू व राजकुमारी चन्द्रावती की बलिदान कथा प्रसिद्ध हैं।  इसी प्रकार सुकेत के देव समुदाय की उत्पत्ति व चमत्कार की अनेकानेक कथायें नीति व इतिहास की धरेाहर हैं। सुकेत की लोकगाथायें देवी- देवताओं की भारथाओं के रूप में प्रचलित हैं। यहां के 11वीं व 12वीं शताब्दी के इतिहास लेखक धूर जट्ट ने यहां के लगभग सभी देवी-देवताओं की गाथाओं का संकलन किया है, जो सुकेत के प्राचीन इतिहास का बहुत बड़ा स्रोत है। सुकेत में प्रचलित बांठड़ा लोकनाट्य ने यहां की सांस्कतिक व साहित्यिक सम्पदा को समृद्ध किया है। शिशिर पूर्णिमा से आरम्भ यह लोक नाट्य लोकानुरंजन से लेकर नीति के अनुशीलन का प्रतिनिधि रहा है। बांठडा़ में नाट्य, गीत व नृत्य की त्रिवेणी का प्रवाह जन मानस में प्रवाहित होता है। सुकेत का लोक साहित्य अपने भाव गाम्भीर्य के कारण लोक में गहरी छाप छोड़े हुए है, परन्तु सुकेती लोक साहित्य लोक संस्कृति के अनुशीलन के अभाव में गरिमा खोता जा रहा है। लोक साहित्य समाज की आत्मा है, यदि अपनी संस्कृति के वैशिट्य को हम खोते जायेंगे तो लोक साहित्य कहां जीवंत व जीवित रह पायेगा। शायद अतीत से दुराव के कारण हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। आवश्यक है कि हम अपनी साहित्यिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति अनुराग पैदा कर इन्हे पुनर्जीवित करें।

साहित्यकार व इतिहासकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश 

Related posts

Leave a Comment