सुख और अध्यात्म

कुँवर आर.पी.सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

    एक व्यक्ति अध्यात्म साधना और ज्ञान की लालसा में एक प्रसिद्ध संत के पास पहुंचा। उस संत की चारों ओर ख्याति थी। चहुं ओर चर्चा थी कि उस संत के आशीर्वाद से बीमार लोग भी स्वस्थ हो जाते थे और बहुतों की परेशानियाँ दूर हो जाती थीं। सुदूर प्रान्तों से आकर लोग यहाँ दुआ मांगते और प्रसन्न होकर लौटते। जब वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा तो देखा कि संत के हाथ में टोकरी थी और वो उसमें से दाना निकालकर पंक्षियों को चुगा रहे थे। तमाम परिन्दे मजे में दाना चुग रहे थे और यह देख संत किसी छोटे बच्चे की तरह खुश हो रहे थे।
      इस तरह उन्हें दाना चुगाते हुए लम्बा समय बीत गया तथा संत ने उस व्यक्ति की ओर देखा तक नहीं। वह शख्स परेशान हो गया और जब वह संत की ओर बढ़ा तो संत ने बिना कुछ कहे उसके हाथ में टोकरी थमा दी और कहा-कि अब पक्षियों संग मौज़ करो। वह व्यक्ति सोंचने लगा कि कहाँ मैं इनसे अध्यात्मिक साधना का रहस्य जानने आया था और ये महराज मुझे पंक्षियों को दाना चुगाने को कह रहे है।
         संत ने उसके मन की बात पढ़ ली और बोले-स्वयं की परेशानियों को भूल कर, हर जीव को आनन्द पहुँचाने के प्रयत्न में ही जीवन की हर सिद्धि और खुशियों का राज़ है। यदि तुम खुद सुख, खुशी, और शान्ति पाना चाहते हो तो यही दूसरों को देना सीखो। यदि तुम यह साध (कार्य) सके तो समझो कि यही तुम्हारी साधना है। जो लोग अध्यात्मिकता को किसी खा़स नियम और जीवन शैली में देखते हैं, वे इसके नैसर्गिक पक्ष से वंचित रह जाते हैं, जबकि आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है दूसरों को सुख बाँटना। ऐसा करने से परमात्मा का वैभव बरसने लगता है और साधक की हर दुआ कबूल हो जाती है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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