किस्मत 

राजेंद्रा कुमारी, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र,

किस्मत का क्या भरोसा पल में साथ छोड़ जाती है,
जिंदगी में ना जाने कैसे-कैसे खेल खेल जाती है?
एक सपना जिसे हम पाना चाहते हैं ,
पल में टूट जाता है।
एक अपना जिसे हम अपनाना चाहते हैं,
पल में रुठ जाता है।
पल में जाने किस्मत क्या रूप दिखा जाती है?
जिंदगी में ना जाने कैसे-कैसे खेल खेल जाती है ?
एक मंजिल जहां हम पहुंचना चाहते हैं,
हमसे दूर हो जाती है।
एक राह जिससे हम गुजारना चाहते हैं ,
पल में बदल जाती है।
इंसान को यह किस्मत क्यों इतना भरमाती है?
जिंदगी में ना जाने कैसे कैसे खेल खेल जाती है ?
एक बूंद जिसे हम पकड़ना चाहते हैं ,
फिसल कर गिर जाती है।
एक जान जिसे हम बचाना चाहते हैं ,
बदकिस्मती से मर जाती है।
यह किस्मत सबको क्यों इतना तड़पाती है ?
जिंदगी में जाने कैसे कैसे खेल खेल जाती है?
कोई चैन से सोता है तो कोई नींद अपनी खोता है।
कोई आनंद से जीता है तो कोई ठोकर खाता है।
कोई गुनाह करके भी बच जाता है ,
तो कोई बेगुनाह फंस जाता है ।
किस्मत भी जिंदगी में हर पल नया मोड़ लाती है।
जिंदगी में जाने कैसे-कैसे खेल खेल जाती है?
गांव डूंग, डाकघर गुम्मा (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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