कुम्हारसेन के राणाओं की शिकारगाह था तितरी का त्रैल

डा हिमेन्द्र बाली ” हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कुम्हारसेन ठाकुराई शिमला हिल्ज स्टेट्स की बारह और अठारह ठाकुराईयों में एक थी। वैदिक नदी सतलुज और तमसा अर्थात् तौंस नदी के मध्य स्थित इन ठाकुराईयों में सिरमौर और बुशैहर बड़ी रियासतें थीं। कुम्हारसैन रियासत की स्थापना गया से आये गौड़ वंशीय किरत सिंह ने 1000 ई में की, परन्तु  ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि जब दूसरी शताब्दी में सिरमौर ने बुशैहर पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान किया तो माता भीमाकाली के क्रोध से सिरमौर की सेना महामारी से काल कलवित हो गई। लौटते हुए सिरमौर का राजा कुम्हारसेन राणा के पास रुका और राणा ने अपनी पुत्री का विवाह राजा से किया। यह घटना कुम्हारसेन के रियासती काल को 1900 वर्ष पीछे ले जाती है।
किरत सिंह से पूर्व यह क्षेत्र कोटेश्वर महादेव की  दैवीय सत्ता के अधीन था। महादेव की दैवीय प्रेरणा से प्रेरित, गया से आया किरत सिंह महादेव का कृपा पात्र बना और महादेव ने कुम्हारसेन की लौकिक सत्ता किरत सिंह को प्रदान की। कुम्हारसेन का नामकरण यहां किरत सिंह से पूर्व बसे अठारह कम्हार परिवारों के कारण पड़ा। इन्ही कुम्हारों की बस्ती को किरत सिंह को देकर महादेव ने उन्हे समीपस्थ भराड़ा में बसाया।
महादेव कोटेश्वर के पूरी रियासत में अठारह बासे अर्थात् मुख्य स्थान हैं, जहां महादेव की दैवीय प्रतिष्ठा है। तितरी का त्रैल कुम्हारसेन के राणाओं का आखेट स्थल था। यह स्थान कुम्हारसेन कस्बे के दक्षिण-पश्चिम में तीन किमी दूर डिगाधार के ठीक नीचे है। इस क्षेत्र में चहुंओर कैल-देवदार का सघन वन है, इसका नाम तितरी का त्रैल इसलिए पड़ा कि यहां तीतर बहुतायत में थे। उस काल में इस क्षेत्र में घना वन था और वन्य जीव जैसे-  बाघ, तेदुए, काकड़, जंगली मुर्गे आदि प्रचुर मात्रा में थे। राणा पलकी में आरूढ़ होकर अनुचरों के साथ यहां आखेट करने आया करते थे। रियासती काल में राणा के आखेट के शौक का गवाह तितरी का त्रैल आज भी घने जंगल से अटा पड़ा है। हालांकि वन्य जीवों की जो संख्या रियासती काल में यहां हुआ करती थी अब नहीं है। फिरभी तितरी का त्रैल रियासती काल के आखेट स्थल के रूप में अपनी पहचान जनमानस में बनाए हुए है, जो कुम्हारसेन के राजसी इतिहास का गवाह रहा है।
लाठी के निवासी अशोक भारद्वाज के अनुसार इस क्षेत्र में शिकार के शौकीन उनके परिजन भी  शिकार किया करते थे। ऐसा ही राणा का आखेट स्थल कुम्हारसेन के देवाधिपति कोटेश्वर महादेव का बासा चेकुल वर्तमान में प्रसिद्ध नाम चमोला खड्ड में था। कहा जाता है कि यह स्थान कुम्हारसेन ने सांगरी रियासत से भैसों के चरागाह के निमित्त लिया था। कालांतर में चेकुल को राणा ने भज्जी के छोटा बल्ल से आए कश्यप गोत्रीय बाली परिवार को दिया। यहां कोटेश्वर महादेव का एक मंदिर स्थापित है। हर छ: माह में एक बार छमाई प्राप्त करने के लिए महादेव के प्रतिनिधि गूर चेकुल आते हैं। रियासती काल में राणा वर्ष में एक बार शिकार के लिए चेकुल भ्रमण पर आया करता था। चेकुल कोटेश्वर महादेव का अठारवां बासा अर्थात स्थान है। 1948 में रियासतों के विलय के बाद राजवंश की वंशीय परम्पराएं भी मिट गईं। कोटेश्वर महादेव अपने पूरे क्षेत्र की धार्मिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के शीर्ष पर प्रतिष्ठित हैं। उत्तराखण्ड के सर्वोच्च देव महादेव केटेश्वर द्वपार युग से हिंगलाज, केदारनाथ व हाटकोटी में प्रतिष्ठित होकर कुम्हारसेन में सहस्राब्दियों से जनमानस के लौकिक व पारलौकिक सौख्य के परमदेव हैं।
साहित्यकार व इतिहासकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश 

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