जात-पांत

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

ज्ञानी आज्ञानी में फर्क, गरीब अमीर में फर्क, रूपवान और कुरूप में फर्क, काले और गोरे में फर्क यह साब़ित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन्सान इन्सान में ही कितनी असमानता व्याप्त है, लेकिन इससे भी विषम स्थित तो जातियता के कारण पैदा हुई ऊँचनीच की खा़ई है, जो वैज्ञानिक पढ़े लिखे समाज में और गहरे तक जड़ जमाये हुए है। हालांकि समय-समय पर तमाम संतो, महापुरुषों ने इस जातियता रूपी विष को दिलों से निकालने का प्रयास किया है, लेकिन सब बातें कालातीत हो गयीं।
संत रविदास परम भगवद्भक्त थे। काशी के संत स्वामी रामानन्द ने उन्हें दीक्षा देते वक्त यह आशीर्वाद दिया था कि भक्ति के क्षेत्र में तो तुम शिखर पर पहुँचोगे ही, तुम्हारे पदों से असंख्य लोग प्रेरणा लेकर अपना जीवन सार्थक करेंगे। आगे चलकर संत रवि ने असंख्य भक्ति पदों की रचना की। संत रविदास अपने प्रवचन और पदों के माध्यम से सदाचार और नैतिकता की प्रेरणा दिया करते थे। वह कहते थे कि भगवान की कृपा उसी क़ो प्राप्त होती है जिसका हृदय लोभ, घृणा और अन्य दुर्व्यसनों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है।
एक बार काशी में कुछ संत उनके सत्संग के लिए पहुँचे। एक साधु ने उनसे सवाल किया कि संत की पहचान किस गुण से होती है। क्या संत केवल ऊँची जाति का ही होता है?? संत रविदास ने उन्हें बताया-

सन्तन के मन होत है सबके हित की बात! 

घट-घट देखें अलख.को, पूछै जात न पांत!!

अर्थात  सच्चा संत वही है, जो सबके कल्याण और हित की बात सोंचता है। जो जातपात के भेदभाव से दूर रह कर ,प्राणी मात्र में सब जगह भगवान के दर्शन करता है। रविदास जी ने एक जगह लिखा है कि जन्म से कोई ऊँच या नीच नहीं होता, बुरा कर्म ही व्यक्ति को बुरा और नीच बनाता है। अच्छे कर्म करने वाले सदैव श्रेष्ठजन होते हैं, भले ही उनका जन्म किसी भी जात में हुआ हो।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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