पशु धन व दूध-घी  की रक्षा और वृद्धि के देव हैं चेकुल के गण देव

डा. हिमेन्द्र बाली “हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश के ग्राम्य परिवेश की समस्त सामाजिकऔर सांस्कृतिक व्यवस्था देव परम्परा द्वारा  संचालित होती है। यहां वैदिक देव समुदाय के अतिरिक्त पूर्व वैदिक देव परिवार के नाग, यक्ष, बेताल व राक्षस आदि की पूजा पद्धति का प्रचलन व मान्यता भी द्रष्टव्य है। हिमाचल के प्रत्येक गांव में, क्षेत्र व अंचल स्तर के देव हैं। साथ ही साथ अनेकानेक अधीनस्थ देव-देवियां हैं, जिन्हे वस्तु विशेष की रक्षा और अभिवृद्धि का दायित्य सौंपा गया है। जिला शिमला की कुमारसैन तहसील की जंजैली पंचायत के गांव चेकुल में माता ज्वाला की पीठ के अंतर्गत गण देवता का मंदिर आस्था के केन्द्र में स्थित है। माता ज्वाला और क्षेत्राधिपति कोटेश्वर महादेव का यह चेकुल गांव लगभग 1880  ई. में राणा कुमारसैन द्वारा भज्जी रियासत से आए तीन भाई हरिसहाय, देवी दास और धनी राम को उपहार स्वरूप दिया गया था। बड़ा गांव सांगरी की परम्परा के अनुसार चेकुल गांव पहले सांगरी का हिस्सा था। कुमारसैन के राणा ने  भैस चराने और आखेट के प्रयोजन से चेकुल को सांगरी के राजा से मांगा था।
चेकुल में प्रतिष्ठित गण देवता को पशुधन की वृद्धि, रक्षा और दुग्ध उत्पाद की वृद्धि के देव माना जाता है। गण देवता को स्थानीय बोली में “गौण” भी कहा जाता है। गण देवता का यह मंदिर कुमारसैन और सांगरी क्षेत्र में इकलौता मंदिर है। वास्तव में गण देवता सुन्नी तहसील के अंतर्गत पूर्ववर्ती भज्जी रियासत के आराध्य देव हैं, जहां देवता को दूधाधारी अर्थात् दूध का रक्षक और दूध का नैवेद्य ग्रहण करने वाला माना जाता है। गण देवता का मुख्य मंदिर शिमला के समीप पतोग में है, जहां गण देव धांधी देव और देव धार की माता के साथ विराजमान है। भज्जी के संस्कृतिविद् नरेन्द्र ठाकुर के अनुसार गण देव सात इलाकों- बमौत, बनूटी, टपोग, कडैची, घैणी, पतोग, तगैली आदि के आराध्य देव हैं। गण के सम्मान में टपोग, बमौत और कडैची में  रात्रि देवोत्सव व लोक नाट्य देवठन का आयोजन होता है। शिशिर पूर्णिमा के तीसरे दिन पड़वा को बमौत, दिवाली के बाद आठवें दिन कड़ैची व नवें दिन टबोग में गण देवता की स्मृति में देवठन का आयोजन होता है।
चेकुल में गण देवता की स्थापना कश्यप गोत्रीय हरिसहाय व अन्य भाईयों ने की thi, जिसकी मान्यता सांगरी व कुमारसैन के अतिरिक्त पूर्ववर्ती भज्जी रियासत के सराज परगने में आज भी गहरे रूप में विद्यमान है। चेकुल में गण देवता का ढलवा छत्तीय लघु मंदिर है, जिसके धरातल में सभा स्थल और ऊपरी अर्ध धरातल पर काष्ठ मंजूषा में भगवान गणेश के मध्य में धात्विक विग्रह के अतिरिक्त अन्य आठ दस पुरूष व महिला गण देव विग्रह हैं। प्रत्येक संक्राति को ज्वाला देवी के मंदिर में पूजा के साथ गण देव को श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए दूध, मक्खन व घी से खीर बनाई जाती है। प्रत्येक परिवार से दूध, घी, मक्खन, गुड़ और गेहूं के आटे का भोग लाया जाता है। इसी अर्पित किये गए कच्चे भोग से खीर व रोटियां बनाकर कर गण देवता को अर्पित किया जाता है। सभी आगत लोग खीर और घी के साथ घी से बनी रोटियों का भर पेट नैवेद्य ग्रहण करते हैं।
गण देवता पशु धन की वंश वृद्धि के लिए विख्यात रहे हैंं। यदि प्रसूता गाय दूध न दे या द्वेषी नजर से घी में पर्याप्त वृद्धि न हो तो केवल गण का स्मरण कर कुछ द्रव्य अथवा दूध- घी मंदिर में अर्पित करने के संकल्प मात्र से सबकुछ सामान्य हो जाता है। गण की कृपा दृष्टि और दैवीय प्रभाव सर्वत्र प्रचलित है। गण को मन्नत पूरी होने पर गाय का पहला घी चढ़ाने की परम्परा है। पूरे क्षेत्र में यदि गाय को गण देवता को समर्पित किया है तो इस परम्परा को गण की मड़ाई या गण की बाई कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि अमुक गाय गण देव के संरक्षण को प्राप्त है। ऐसी गाय यदि नव प्रसूता है तो गाय के दूध से श्रद्धा स्वरूप अढाई या आधा किलो घी देवता को अर्पित करने के लिए रखा जाता है। इस परम्परा को हाशा-निशा कहा जाता है। अर्थात् जब तक गण देवता के लिए उचित मात्रा का घी तैयार न हो जाए, उस अवधि में नव प्रसूता गाय का दूध किसी को नहीं दिया जाता है। भज्जी के गढेरी गांव के संस्कति मर्मज्ञ प्रेम लाल वर्मा के अनुसार भज्जी में गोधन व दुग्ध उत्पाद के देवता महादेव पंदोई के सशक्त देव ढैवकर है, जो रौद्र प्रवृति के हैं। ढैवकर के संरक्षण को प्राप्त गाय का दूध और मक्खन किसी बाहरी व्यक्ति को देना वर्जित है। अत: यहां के लोग एक गाय को ढैवकर को छोड़ कर अन्य गाय को गण का संरक्षण देकर नरम नियमों को प्राथमिकता देते हैं। भज्जी के लोग आज भी बड़ी संख्या में कई वर्षों का पड़ा घी गण को चढ़ाने चेकुल आते हैं।
गोवंश वृद्धि के गण देव वास्तव में ऋद्धि-सिद्धि प्रदाता भगवान गणेश ही है। चेकुल के मंदिर में चतुर्भुज गणपति लम्बोदर सभी गणों के मध्य में प्रतिष्ठित हैं। भगवान् गणेश गणों के अधिपति हैं, अत: यहां भगवान् गणेश अपने अधीनस्थ गणों के साथ विराजित होकर गोधन को संरक्षण प्रदान करते हैं। पूर्व में यहां की बाली बिरादरी में हर घर में गण प्रतिष्ठित थे। कालान्तर में परिवार में पवित्रता और पूजा विधान परम्परा अनुकूल न होने के कारण मंदिर में गणों को स्थानांतरित किया गया था। अब एकाध परिवार को छोड़कर मंदिर में ही गणेश व गण समुदाय प्रतिष्ठित हैं। गण देवता के मंदिर में पाच-सात वर्ष में एक बार भाटी भोज उत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर गण के भण्डार में संचित घी का भोज में प्रचुरता से प्रयोग और उपभोग किया जाता है। वास्तव में भाटी भोजोत्सव पुराने पड़े घी को श्रद्घालुओं को भोज रूप में खिलाने के प्रयोजन से ही आरम्भ किया गया होगा। चेकुल में प्रतिष्ठित गण देव आज के प्राविधिक युग में जब पशु धन उपेक्षित हैं और सड़कों में निराश्रित होकर जीने के लिए अभिशप्त है,ऐसे में गोधन के प्रति आस्था भाव को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।
आज गण देव का ढलवा छत्तीय मंदिर जमींदोज हो चुका है। गणेश भगवान का पूरा परिवार अस्थाई शिविर में प्रवास पर है। हिमालयी संस्कृति के धरोहर इस मंदिर को पुन: नवरूप देने का दायित्व हिमाचल भाषा कला व संस्कृति विभाग का है, जो प्राचीन संस्कृति व कला के संरक्षण के लिए औपचारिक रूप से उत्तरदायी है। विभाग से निवेदन रहेगा कि धर्म संस्कृति और कला के प्रहरी हमारे ऐसे मंदिरों के नवोन्मेष व उद्धार के लिए जमीनी सर्वेक्षण भी किया करे, ताकि विलुप्त होती हमारी विशुद्ध संस्कृति को नवजीवन प्राप्त हो सके।
गोवंश का संरनक्षण हम भी का सामूहिक दायित्व है। यदि हम अपनी गोधन पूजा की प्राचीन परिपाटी को जीवित रखेंगे, तभी निरीह व मूक गोवंश में तैंतीस कोटि देवों की वैदिक मान्यता फलितार्थ होगी और गण देव का संरक्षण मिलने से दूध-घी, जिसे शास्त्रों में अमृत तुल्य माना गया है, की श्रीवृद्धि भी होगी।

इतिहासविद् व साहित्यकार नारकण्डा (शिमला) हिमाचल प्रदेश 

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