जख्म

कल्पना गांगटा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भरे नहीं कभी जो जख्म
अपनों ने ही तो दिए हैं…
शिकवा किसी से क्या करे वो
सपनों में ही जो जीए हैं।
दिल दुखे न किसी का हमसे
तभी  होंठ भी सी लिए हैं।
भरे नहीं कभी जो जख्म………….
भीगे- भीगे से नयन भी अब
अश्क छुपाए हुए हैं,
खोले क्या अब राज वो
दिल में जो दबाए हुए हैं,
भरे नहीं कभी जो जख्म………….
उन यादों को करे दूर कैसे
मन में जो डेरा बसाए हुए हैं…
छीन रहे हैं पंख वही जो
नकाब अपनेपन का ओढ़े हुए हैं।
भरे नहीं कभी जो जख्म………….
गांगटा निवास (लम्बीधार) ढल्ली, शिमला, हिमाचल प्रदेश 

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