बसंत समया जाके

डॉ. दशरथ मसानिया,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

गौरी प्रीतम आस मे, निशिदिन करे विचार।
कामबाण हिय मे लगो, करती हा हा कार।। 1
सिसक सिसक के रोरही, अंसुअन बहती धार।
 हिरदे धड़कन धड़कती, रोम रोम इजहार।। 2
केश बाँध चोटी करी, नागिन सी दिखलाय।
उदर झरोखा नाभि का, सबका मन भरमाय।। 3
मन्द मन्द मुस्कात हैं, नैना बने कटार ।
बागन मे संगत करे, कलिया कहे पुकार।। 4
पान खाय अधरा चलें, भौहन से बतराय ।
कानन की लटकन हलें, नथनी झोका खाय।। 5
हाथन झाला साधके, नैन रही मटकाय।
आंगुरि मुख मे दे रही, साड़ी तन लहराय।।6
दाखन रंग बदल रहे, कपोत करें किलोल।
गौरी कहती साजना,धीरे धीरे बोल।। 7
घूंघट को पट खेंचके, चन्दा करो बहार।
अमावस से पूनम भइ, नदिया मे पतवार।। 8
बसन्त समया जानके, साजन सजनी भाय।
तन मन का एका भयो, अंग अंग हरषाय।। 9
इंजिन लोहापथ चले, छुक छुक करती रेल।
धीरज राखो साजना,दरवाजे मत खेल। 10
गहन कूप मुख सांकरो,लांबी लागे लेज।
दीया बाती मेल से. चरमर होती सेज।। 11
सुधा बूंद चिड़िया पियो, ची ची होती मौन।
 सांसन मे सांसे मिली, ज्यो भोजन में लोन।। 12
कली फूल सी खिल गई, महक उठा सबअंग।
भौरा भी गुंजन करे, लोहा चुम्बक संग।। 13
23, गवलीपुरा आगर, (मालवा) मध्यप्रदेश

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