टीशु पेपर

कल्पना गांगटा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

नन्हा यश कमरे में खेल रहा था उसी समय उसकी नज़र शैल्फ पर रखे पोस्टर कलर पर पड़ गई जैसे ही वह निकालने लगा कलर उसके हाथ से गिर कर फर्श पर बिखर गए। हड़बड़ी में समेटने की कोशिश में उसने अपनी शर्ट के साथ साथ हाथ और मुंह भी खराब कर दिए। यश की माँ नीलम भी कुछ आवाज सुनकर यश के पास दौड़ी आई। जब देखा कि बच्चा गंदा हो गया तो डांटते हुए बोली-क्या कर दिया, हैंडज भी गंदे और शर्ट भी। अपना फेस तो देखो जरा कलर लगा दिया…. दिन भर उछल कूद करते हो। गुड ब्वॉय की तरह रहा करो। यश की दादी रूमती बालकनी में कपड़े सुखाने को डाल रही थी, वह भी बच्चे के पास आकर बोली-क्यों इसे डांट रही हो? बच्चा ही तो है। गुस्सा करके क्यों अपना खून जला रही हो, फिर इसमें यश की गलती भी क्या है? कलर का पैकेट गिर कर एक दो कलर बिखर भी गए तो….। रूमती की बात को बीच में ही काटते हए नीलम बोली-माँ आपने ही इसे बिगाड़ रखा है। अब कौन फर्श साफ़ करेगा, तभी मैं आपको कहती हूँ, कि इसको विडियो गेम ही खेलने दिया करो, कम से कम एक जगह तो बैठा रहता है। रूमती-अभी साफ कर देती हूँ फर्श। विडियो गेम से तो लाख दर्ज अच्छा इसका उछल कूद करना, बैट बाल खेलना, और मस्त रहना है। हमें आंखे नहीं फ़ोड़नी हैं अपने बच्चे की। यश नज़र झुकाए, अपराध बोध लिए, रोनी सूरत बनाकर खडा था। दादी बोलती जा रही थी, हमारे जमाने में तो इतना काम होता था, साथ में बच्चे भी ज्यादा, बडा परिवार सब-कुछ संभालते थे। हम सही में कह रहे हैं, सुबह का साफ किया हुआ घर खलिहान से कम न लगता था और मजाल है कि कोई चीज़ अपनी जगह पर मिल जाए। अरे तुम लोगो को तो काम ही कितना है, सारी सुविधाएं फिर भी एक बच्चे को नहीं संभाल पाते। नीलम को सास की बातों में कोई रूचि नहीं थी, बेटे को दादी के हवाले कर वह अपने बैडरूम में चली गई। यश दादी के गले लगकर बोला-सौरी दादी! मेरे कारण आप तंग हो गए। रूमती-अरे नहीं बेटा! बच्चे का मुंह साफ़ करके रूमती ने उसे बड़े प्यार से सोफे पर बैठाया। रूमती-चलो अब तुम चुपचाप यहाँ बैठो, मैं फर्श साफ करती हूँ और तुम फिर अपनी शर्ट भी बदल लेना। यश दादी को देख रहा था, दादी ने खुद ही यश के हाथ पोंछे फिर अपने अनसुलझे बाल पीछे को बांधकर फर्श साफ़ करने लगी। काम करने के बाद वह बच्चे के पास बैठ गई और मुस्कुराते हुए बोली-क्यों रे! ऐसे क्या देख रहा है? यश-दादी मम्मा कहती है कि टीशू से हाथ पोंछने चाहिए।अब हम रिच फैमली है, बड़े शहर में रहते हैं, मम्मा कहती है कि हमें रिच लोगों से ही दोस्ती करनी चाहिए। खाने-पीने, उठने-बैठने का सलीका सीखना चाहिए। कल भी जब मेरे हाथ से डाइनिंग टेबल पर सोस गिर गया था तो मम्मी के टीशू पेपर खींचने से पहले ही आपने हाथ से ही साफ कर दिया था। दादी! आपने ऐसा क्यों किया? आप टीशू पेपर हो क्या, या फिर आपने टेबल मैनर्स कभी नहीं सीखे? आप पापा को मेड भी नहीं रखने देती। हमारे पास तो बहुत पैसे है न दादी, फिर आप मम्मी की तरह क्यों नहीं रहते? क्या आप को आराम करना अच्छा नहीं लगता, कितना काम करते हैं आप। बच्चे की मासूमियत भरी बातें सुनकर रूमती मुस्कुराई, प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली-अरे बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है बेटा। तुम सब मेरे अपने हो और मुझे बहुत प्रिय भी हो। तुम्हारे लिए यह सब करना मुझे अच्छा लगता है। अपनी टोन बदलते हुए दादी बोली-चल अब बेकार की बातें छोड़ और कुछ पढ़ाई- बढ़ाई भी कर लो, नहीं तो फिर गुस्सा करेगी तुम्हारी मम्मा। यश खुश होते हुए-ओके दादी! लव यू…. कहते हुए वहाँ से भाग गया। रूमती को यश की बातें सोच कर हंसी आ गई और वह अपने अतीत में चली गई। स्वयं से ही बोली-सही तो कहा बच्चे ने। मैं टीशू से सबने अपने स्वार्थ के लिए यूज किया और फेंक दिया। मैं ही क्यों, मेरे जैसे कितने सारे लोग है इस संसार में, जिन्हें कभी टेबल मैनर्स सीखने का समय नहीं मिला और सबकी खुशियों और आराम का ध्यान रखते हुए कब टीशू पेपर की तरह यूज होकर स्वाह हो जाते हैं पता भी नहीं चलता। रूमती को अपना गाँव, खेत खलिहान और वहाँ का जीवन सब कुछ याद आ जाता है। रूमती अपने मां-बाप की अकेली संतान थी। शादी के बाद जब ससुराल आई तो उसे भरा पूरा परिवार मिल गया था। सास-ससुर, जेठ-जेठानी उनके बच्चे और सभी बहुत पसंद करते थे। रूमती को उसका पति प्रताप तो जान छिड़कता था उस पर और उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का पूरा ख्याल रखता था। रुमती पढ़ी-लिखी थी और उस समय बड़े आराम से उसे नौकरी भी मिल जाती, पर ससुर ने पहले ही उसके मां-बाप से कोरी सी बात कर रखी थी कि हमारे पास किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं है। बेटा भी अच्छा खासा कमा लेता है, फिर बहु से नौकरी करवा कर हर्म खानदान की नाक तो कटवानी नहीं। रुमती के मां-बाप भी खुश बाप भी इसी बात से खुश थे कि उनकी बेटी को अच्छा खानदान, परिवार और अच्छा लड़का मिल गया। नौकरी करके क्या करेगी, यही सोचकर उन्होंने लड़के वालों की हर शर्त मंजूर कर ली। बस वहीं से रूमती के समझौते का सफर शुरू हो गया था। विवाह के बाद कुछ समय के लिए तो सब कुछ सही रहा। रूमती सबकी जिम्मेदारी उठाते हए घर का सारा काम करती और सबकी देखभाल भी करती रहती थी। प्रताप का तबादला शहर में कहीं दूर हो गया था, जिस कारण घर आना भी कभी- कभार ही हो पाता था। जेठ जमीन की आय पर ही निर्भर थे। दो बेटे भी थे, जिन्हें जेठानी ने अपना दिमाग चला कर प्रताप के पास अच्छी शिक्षा दिलवाने के लिए शहर भेज दिया। समय बीतता गया, रूमती ने भी दो बेटियों को जन्म दे दिया था। अब सास छोटी बहू से सर्व गुण सम्पन्न होते हुए भी नाखुश थी, क्योंकि वह उसे पोता नहीं दे पाई थी। परिवार में भी अब पहले जैसा प्रेम भाव नहीं रह गया था। बात-बात पर रुमती को टोका जाने लगा। जेठ-जेठानी ने सास-ससुर से जमीन का बंटवारा करवा लिया था। रुमती की सास ने उस पर दबाव डाला कि तीसरा बच्चा देख लो, नहीं तो तुम्हारे हिस्से की जमीन जायदाद भी बेटों को जाएगी बेटियां तो पराई होती है। रूमती को ये सारी बातें पीड़ा देतीथी। परिवार का बंटवारा, जमीन-जायदाद का बंटवारा और यहां तक कि अब तो परिवार के बच्चे भी मेरे-तेरे हो गए। वह मन ही मन सोचती कि अगर मेरे बेटा नहीं है तो दीदी को भी तो बेटी नहीं हुई। क्या सब आपस में भाई-बहन की तरह मिलकर नहीं रह सकते? जेठानी के बच्चों वीर और सार्थक पर जान लुटाती थी रुमती, किन्तु जेठानी का प्रेम उसकी बेटियों के लिए वैसा नहीं था। प्रताप ने भी उनका पूरा ध्यान रखा, उन्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दी। खर्चे बढ़ जाने के कारण वह घर के लिए भी हर महीने पैसे नहीं भेज पाता था। रूमती की बेटियों को गांव के ही स्कूल में डाला गया था। रुमती अपनी बेटियों को हर खुशी देना चाहती थी, इसलिए दिन-रात अपनी परवाह किए बिना खेतों में काम करती रहती और जब कभी प्रताप को समय मिलता तब बेटियों को भी शहर घूमने ले जाते। रूमती पढ़ी-लिखी तो थी ही, तो अपनी बेटियों की पढ़ाई में उसने लापरवाही नहीं बरती। इसी तरह समय बीतता गया। कुछ सालों बाद एक दिन अचानक ही रुमती आंगन में चक्कर खाकर गिर पड़ी। सास घबरा गई और नजदीक ही डिस्पेन्सरी में उसे दिखाने ले गई। सभी सोच रहे थे कि रुमती को कमजोरी के कारण ऐसा हो गया, लेकिन वहाँ जाकर पता चला कि वह पेट से है। रूमती को आराम करने की हिदायत दी गई। जेठ-जेठानी के बच्चों की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और वीर की तो सरकारी नौकरी भी लग गई थी। जेठानी ने ऐलान किया कि वह अपने हिस्से की जमीन गाँव में किसी को चलाने को दे देंगे और बच्चों के साथ शहर में ही रह लेगा। सास-ससुर ने भी उनकी जिद्द के आगे घुटने टेक दिये। रुमती के मन में भी अब बेटे की चाह थी। प्रताप भी शहर में अब अकेला ही था। जेठानी अपने परिवार के साथ खुश थी। रुमती को बेटियों का सहारा था, जो दादा-दादी की देखभाल के साथ साथ घर के कामों में रूमती का हाथ भी बंटाती थी। बीच में प्रताप भी घर आकर सबकी खबर लेने आ ही जाता था। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया, जब रूमती ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। परिवार में खुशी का माहौल छा गया। एक साल बाद रूमती के ससुर भी चल बसे। सास की तबियत भी ठीक नहीं रहती थी। प्रताप पूरे परिवार को शहर ले जाना चाहता था, पर मां अपने घर को छोड़कर जाने को तैयार नहीं थी। प्रताप ने बझ समझाया-अम्मा मैं अपने बेटे रोहन को शहर में ही किसी अच्छे स्कूल में पढाना चाहता हूँ। बेटियों की आगे की पढ़ाई भी वहीं साथ रहना जरूरी है, फिर मैं आपको अकेले कैसे यहाँ छोड़ दूं? रूमती की सास टस से मसला नहीं हई। रूमती ने सास के साथ रहना मंज़ूर किया और प्रताप से बोली- माँ को मेरी जरूरत है, फिर गाँव में हमारी इतनी पुश्तैनी जमीन जायदाद भी है, ऐसे कैसे सब कुछ छोड़ कर जा सकते हैं। सास की आंखों से आंसू टपक रहे थे। आज उसे अपनी बहू पर गर्व महसूस हो रहा था। प्रताप को भी यह बात रास आ गई कि बेटियां बडी है और समझदार भी, सबका ख्याल वो रख लेंगी। रोहन की पढ़ाई में भी सहयोग करेगी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। रूमती की बेटियों की शादियां हो गई और दोनों ने अपना कैरियर भी बना लिया था। बड़ी बेटी को बैंक में नौकरी मिल गई थी और छोटी बेटी एक प्राईवेट कंपनी में मैनेजर बन गई। रूमती बहुत खुश थी। बेटे की पढ़ाई भी पूरी होने को दो साल थे। प्रताप की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया। बेटे की मौत की खबर सुनकर रूमती की सास भी गुजर गई। रुमती पर तो पहाइ टूट पड़ा था। बेटा रोहन भी दुनियादारी की ज्यादा समझ नहीं रखता था। सरकारी नौकरी करना उसे पसंद नहीं था तो पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने रेडीमेड गारमैट्स का व्यवसाय शुरू कर दिया। रोहन ने शहर में ही अपनी पसंद की लड़की नीलम से शादी कर ली थी। वह रुमती को भी अकेले नहीं रखना चाहता था, इसलिए गाँव में सब कुछ बेचकर शहर में ही बस गया। रुमती ने बेटे-बहु की खुशी के लिए सब कुछ स्वीकार किया। अब वह अपने नन्हें यश के साथ समय बीता कर खुश रहती थी। कभी-कभार रोहन और नीलम को अपने रईस दोस्तों के सामने माँ के रहन सहन के ढंग और पहनावे से दिक्कत होती तो रूमती खद ही सब कुछ भांप जाती और किनारा कर लेती थी, पर वह इसी बात से संतुष्ट थी कि उसके सभी बच्चे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी रहे हैं और खुश भी है।

गांगटा निवास (लम्बीधार) ढल्ली, शिमला, हिमाचल प्रदेश 

Related posts

Leave a Comment