क़ाबिल

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

        ग्रीस के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। उसे बचपन से ही पढ़ने और नई-नई चीजें सीखने का बड़ा शौक था। अपने हमउम्र बच्चों की तरह शैतानियों में उसका मन नहीं लगता था। अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर वह कम उम्र में ही बड़ा विद्वान बन गया। एक बार उसे पता चला कि राज्य में प्रशासनिक कार्य हेतु 300 जगह खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था, उसने तुरन्त अर्जी भेज दी। योग्य तो वह था ही, साक्षात्कार भी संतोषजनक हुआ था, लेकिन जब रिजल्ट निकला तो पता चला कि पिडार्टस का नाम नौकरी पाने वालों की लिस्ट में नहीं है। जब इस बात का पता पिडार्टस के साथियों और जानने वालों को चला तो सबको दु्ख हुआ, सबने सोचा कि पिडार्टस भी दुःखी होगा। यह सोंचकर वो सब मिलकर सांत्वना देने उसके घर पहुँचे।
सभी अपनी अपनी भावनाओं के अनुरूप उसे दिलासा दे रहे थे। पिडार्टस ने सबकी बात सुनी और हंसकर कहने लगा-मित्रों! इसमें दुःखी होने की क्या बात है?  मुझे तो यह जानकर खुशी हुई है और गर्व है कि हमारे राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले 300 युवा हैं। मेरा राज्य योग्य और विद्वानों से भरा पड़ा है, इससे हर्ष की बात और क्या होगी। इसके बाद भी उसके कई दोस्त शान्त न हुए और कहने लगे कि जरूर कोई गड़बड़ी हुई है। पिडार्टस जैसे सर्वथा योग्य का चयन होना ही चाहिये था।  इस अन्याय का विरोध होना चाहिए और हमारी मांग है कि मामले की जाँच होनी चाहिए। तब पिडार्टस ने उन्हें समझाते हुए कहा कि इस संसार में अनगिनत विशिष्ट लोग भरे पड़े हैं। योग्यता की कोई सीमा नहीं होती। हम अपने को ऊँचा और दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं, बल्कि हमें धैर्य रखना चाहिए, साथ ही नये हौंसले के साथ फिरसे प्रयास जरूर करना चाहिये। हालांकि आज हमारे देश मैं इस समय भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार के कारण तमाम प्रतिभायें मुर्झा जाती हैं और अयोग्य चुन लिये जाते हैं, यह भी सत्य है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ 

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