अकेला सफर (लघु कथा)

डा हिमेन्द्र बाली “हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

दरवाजा खोला तो बेटा बहू सामने थे। पिता जी नौकर के साथ आत्मीय संवाद में मशगूल थे। चेहरे पर बरसों बाद चमक लौट आई थी। देखो बेटा! मजबूरी भी आदमी को क्या बना देती है। कभी इसके बाप दादाओं के बास सैकड़ों बीघा जमीन थी। कह रहा है कि हमारी जमीदारी मशहूर थी। ठाकुर लोग भी कतराते थे। समय का फेर है, आज न जमींदारी रही न रुतबा…..। पिता कहे जा रहे थे और बेटा बहू को उनका नौकर के साथ ऐसी घनिष्ठता का व्यवहार अशोभनीय लग रहा था। पिता जी भी बच्चों जैसा व्यवहार करने लगे हैं, कामन सैंस जैसे पलायन ही कर गई। नौकर को सिर पर चढ़ा देंगे तो घर का काम कैसे निकाल पाएंगे?
दोनों के मन में गुस्सा जैसे उमड़ कर बाहर निकलने को उतावला हो उठा था। नौकर रामू बेटा बहू के चेहरे से फूट रहे क्रोध से विदग्ध हो रसोई की ओर जा मुड़ा। वह अपराध बोध के नीचे दबा जा रहा था। बाबू जी कितना अपनापन रखते हैं। मेरे बाबूजी की तरह नसीहत दे कर जीने का रास्ता सुझा देते हैं, परन्तु मेरी वजह से कहीं पिता जी को भाई-भाभी जी जली कटी न सुना बैठे।
उसका अनुमान सही निकला। पत्नी अपने कमरे में जाकर पति पर भड़क उठी, तुम्हारे पिता की इन छिछोरी आदतों से तंग आ गई हूं। नौकर के साथ परिवार की बातें सांझा करना कहां तक उचित है? पति ने पत्नी को शांत करते हुए कहा-अरे बड़ों पर अंगुली उठाने से क्या होगा, वो बदलेंगे नहीं। पत्नी ने गुस्साते हुए कहा-तो इनके बर्ताव को ऐसे झेलती रहूं। पिता दरवाजे के बाहर यह सब सुन रहे थे। उन्होने नौकर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- रामू! देखा तुमने? अपना ही घर सराय बन जाता है। अपनी खेती ही जब विष बेल पैदा करे तो दोष किसे दें?
पिता की आवाज में घोर पीड़ा झलक रही थी। रामू के मन में पिता के प्रति पितृ प्रेम छलक उठा था। अपने दिवंगत पिता का प्रतिबिम्ब बाबू जी में उसे नजर आ रहा था। ….काश! मेरी इतनी हैसियत होती तो बाबू जी को अपने घर ले जाकर जी-भर इनकी सेवा करता। मैं बचपन में पिता के प्रेम से वंचित हो गया था। बाबू जी ने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर ऊंचे ओहदों तक पहुंचाया। मैं इनका पुत्र होता तो इनकी पूजा करता। रामू पिता प्रेम में विह्वल होकर कर पिता से लिपट गया। पिता की संतान स्नेह में प्यासी  छाती आज जैसे राम को गले लगाकर तृप्त हो गई।

साहित्यकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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