बैल पूजा से जुडा़ है जाच्छ काण्डा का शकूरा देवोत्सव

डा. हिमेन्द्र बाली “हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा के पर्वोत्तर में जाच्छ-चरखड़ी सड़क पर छोल गढ़ के अंचल में  काण्डा नामक स्थान पर नृसिंह भगवान का मंदिर सम्पूर्ण मण्डी-सुकेत क्षेत्र में पशु धन वृद्धि, रोग निवारण, भूत बाधा निवारण और फसलों की वृद्धि के लिए विख्यात है। नाचन निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत इस गांव का सांस्कृतिक परिदृश्य सनातन परम्परा का जीवंत उदाहरण है। काण्डा गांव में नृसिंह भगवान का पैगोडा मण्डपीय शैली का मंदिर बना है। मंदिर के समीपस्थ नृसिंह भगवान के वृषभ रूप गण द्वय राम्बी और चाम्बी का लघु मंदिर स्थित है। मंदिर में दोनों गणों के बैल रूप में विग्रह विराजमान है। नृसिंह भगवान का मूल स्थान झुंगी पंचायत में झुंगी खड्ड के किनारे नृसिंह गांव में है। गांव का नामकरण भी देव के नाम से हुआ माना जाता है। इस स्थान से जुड़ा एक लोकाख्यान यहां भगवान नृसिंह व दो वृषभ देवों की प्रतिष्ठा को उद्घाटित करता है।

मान्यता यह है कि सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्घ में इस गांव के एक खेत में नृसिंह नाम का एक किसान धान की रोपाई करते समय जुते बैल की जोड़ी सहित भूमिगत हो गए थे, जो कुछ समय बाद दिल्ली में बाहर निकले। नृसिंह नामक यह किसान सिद्ध पुरूष और अलौकिक शक्ति सम्पन्न था। इस अद्भुत घटना के बारे में जब बादशाह अकबर को पता चला तो उसने  उस हलधर को बुलाकर उस से पूछा कि जुते बैल सहित तुम यहां कैसे प्रकट हुए हो? आखिर तुम कौन हो और कहां से आए हो? नृसिंह ने उत्तर दिया-हलदू बलदू सीड गराऊं, राम्बी चाम्बी बल्द नृसिंह मेरा नांव। अर्थात् मेरा नाम नृसिंह और राम्बी चाम्बी ये दो मेरे बैल हैं। हल चलाते में यहां प्रकट हुआ हूं। इस चमत्कारिक घटना से प्रभावित  मुगल बादशाह ने नृसिंह के मूल स्थान को खोजने के लिए अपने लोग भेजे। जब वे नृसिंह गांव में उस स्थान पर आए, जहां नृसिंह अलौकिक रूप से भूमिगत होकर दिल्ली निकले तो देव कोप से एक शिला प्रहार करती मुगल बादशाह के लोगों को पीछे धकेलती आगे बड़ी। परिमाण स्वरूप बादशाह के लोग पीछे लौटते गए। आज भी नृसिंह द्वारा प्रक्षेपित शिला जाच्छ के समीप काण्डा स्थान पर है, यहीं नृसिंह व दोनों वृषभ गण राम्बी और चाम्बी के मंदिर है।


काण्डा में हर तीसरे या चौथे वर्ष देवता के क्षेत्रवासी “हार” के लोग देवता व उनके दोनों गणों के सम्मान में बड़े यज्ञ शकूरा  का आयोजन करते हैं। इस बार यह यज्ञ माघ शुक्ल नवमी को 21 फरवरी को पारम्परिक ढंग से मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर सम्पूर्ण सुकेत व मण्डी के अतिरिक्त हिमाचल के अन्य जिलों से श्रद्धालु आकर देव का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। नृसिंह के गूर लोकराज का कहना है कि इस अनुष्ठानिक देवोत्सव पर देव खेल का आयोजन होता है। नृसिंह व वृषभ देव  के गूर देव शक्ति के आरोहण पर आगत जनता को आशीष प्रदान करते हैं। राम्बी और चाम्बी गणों के गूर बैल की प्रकृति के अनुकूल भाव भंगिमाएं कर लोगों को आशीष प्रदान करते हैं।
नृसिंह देव व वृषभ देव के मूल स्थान नृसिंह में लघु मंदिर अवस्थित है। यहां वह खेत भी है, जहां नृसिंह किसान जुते बैल सहित भूमिगत होकर दिल्ली में यथारूप प्रकट हुए थे। संस्कृति मर्मज्ञ डा. जगदीश शर्मा का कहना है कि आज भी नृसिंह गांव में यह परम्परा है कि घटना से जुड़े खेत में जब धान की रुणी अर्थात् पहली पौध की शाखाएं वृषभ देवों को अर्पित कर फिर  खेत में रोपी जाती है। धान का पहला अंश बनाकर उसकी माण्ड को राम्बी व चाम्बी गणों की मूर्ति के समक्ष पथ्थर पर बड़ी मात्रा में रखा जाता है, जिसे चमत्कारिक रूप में देवों द्वारा ग्रहण किया जाता है। सारी माण्ड क्षण भर में आंखों के समक्ष गणों द्वारा ग्रहण कर ली जाती है। चावल का पहला भोग गणों को चढ़ता है। शकूरा देवोत्सव के अतिरिक्त नृसिंह देव सात वर्ष बाद अपनी हार के फेर पर निकलते हैं।
नृसिंह देव और बृषभ देव के दैवीय प्रभाव से जाच्छ व झुंगी क्षेत्र में कभी भी पशुओं के खुरों का घातक रोग खुरपा कभी नहीं होता। इस बार का शकूरा देवोत्सव कोरोना महामारी के शमन के संकल्प के साथ आयोजित हो रहा है। हजारों की संख्या में लोग यहां आकर अपने दुख दैन्य के शमन की प्रार्थना करते हैं। आज जहां पशु धन विशेष कर बैल मशीनी युग के कारण उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। ऐसे समय में जाच्छ व झुंगी में वृषभ पूजा का विधान नि:संदेह वैदिक कालीन पशुचारण सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था का स्मरण दिलाता है।


साहित्यकार व इत्हासविद कुमारसैन शिमला हिमाचल प्रदेश 

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