कुमारसैन क्षेत्र से शक्ति स्थलों का है गहरा व पुराना नाता

डा. हिमेन्द्र बाली हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

वैदिक वांडमय में शक्ति पूजा की व्यापक परम्परा रही है। मानव सृष्टि के आरम्भिक काल में भौतिक जगत की अतुल शक्तियों से अभिभूत होकर प्रकृति के विभिन्न रूपों के पूजन की परम्परा आरम्भ हुई थी। वैदिक काल में प्रकृति के विविध रूप जैसे नदी, पर्वत, जल, ऊषा, संध्या व अरण्य आदि देवियों की स्वच्छंद उपासना की परम्परा थी। हिमाचल का सम्पूर्ण क्षेत्र पुराणों में वर्णित पर्वतराज हिमालय के पांच खण्ड -नेपाल, कूर्मांचल, केदार, जालंधर और कश्मीर में से जालंधर खण्ड के अंतर्गत था। यहां सागर पुत्र जालंधर का राज्य था, जिसका वध भगवान् शिव ने किया था। यहीं जालंघर खण्ड में शक्ति के 52 पीठों में से बृजेश्वरी, ज्वालामुखी, चामुण्डा जैसे सिद्ध पीठ युगों से शक्ति के पावन पीठ हैं। इसी जालंधर खण्ड में सतलुज नदी के दक्षिणी क्षेत्र में कुमारसैन तहसील में अनेक शक्ति पीठ हैं, जिनकी मान्यता अगणित काल से चली आ रही है।
वैदिक नदी सतलुज के किनारे बसे कुमारसैन क्षेत्र में शैव, शाक्त व नाग मत की परम्परा प्रचलित है। कुमारसैन के देव शिरोमणि अष्टकोटि देव कोटेश्वर महादेव की एकछत्र मान्यता है। कहा जाता है कि कोटेश्वर महादेव पाकिस्तान में स्थित शक्ति पीठ हिंगलाज से आए थे। हिंगलाज से केदारनाथ होते पब्बर नदी के किनारे शक्ति धाम हाटकोटी आए थे। हाटकोटी से कुमारसैन में प्रकट हुए और अपने प्रताप से इस क्षेत्र के देवाधिपति बने। ऐसी भी मान्यता है कि कोटेश्वर का मंदिर पूर्व में कोटखाई के सराटा नामक स्थान पर था, जहां अतिवृष्टि के कारण मंदिर ध्वस्त हो गया था और कोटेश्वर का लिंग रूप में विग्रह हाटकोटी पहुंच गया, जहां से महादेव कुमारसैन में प्रादूर्भूत हुए।


कोटेश्वर महादेव की स्थानीय परम्परा में कुमारसैन के समीप कचेड़ी गांव की आदि शक्ति देवी, कुल्लू के बाहरी सिराज के खेगसू में प्रतिष्ठित आदि शक्ति कसुम्भा एवम् नारकण्डा के उतुंग पर्वत हाटू पर स्थापित हाटू कालिका कोटेश्वर महादेव के साथ ही कुमारसैन क्षेत्र में प्रतिष्ठित हुई। ऐसी मान्यता है कि जब ओबू और शोबू ब्राह्मणों ने महादेव को देवियों व दो मात्रिकाओं सहित तुम्बी में बंद कर हाटकोटी से चालीस मील दूर सतलुज में देव शक्तियों को विसर्जित करने चले तो दैवयोग से सतलुज से दो मील दूर पर स्थित पड़ोई बील स्थान पर पांव में ठोकर लगने से तुम्बी के हाथ से गिरने पर फट गई थी। महादेव बणा व भेखल की झाड़ियों में छिप गए। एक माता आकाश मार्ग से कचेड़ी की चोटी टिक्कर पर कैल के वृक्ष में वास करने लगी। अन्य माता सतलुज पार पहले पांजवी और अंतत: खेगसू में प्रतिष्ठित हुई थी। ऐसा माना जाता है कि तीसरी माता हाटू पर्वत पर प्रतिष्ठित हुई थी। कचेड़ी माता महलक्ष्मी, कसुम्भा माता महासरस्वती और हाटू की देवी महाकाली रूप में स्थापित हुई। यह तीनों देवियाें में कसुम्भा देवी और कचेड़ी देवी कोटेश्वर की बहिने हैं। रियासती काल में कहते हैं कि हाटू की कालका अपनी तीन सहेलियों के साथ घूमती हुई केपू व खेखर गांवों में आईं थी और यहां रामसिंह राणा ने देवियों को धान  रोपने लगाया था। इस सम्बंध में एक गीत भी प्रचलित है-
हाटवी कालके केपू खेखरा शांह दी आई, रामसिंह राणये धाना रुंवदी लाई
इस दौरान खेखर के सवाणे (खेखर से कुमारसैन राज महल तक राज पथ) के मंझकी देवरी से हाटू की महाकाली ने अपनी सहेलियों के साथ ऐसा लाम्मण (लोक गीत) गाया कि राणा ने देवियों से क्षमा मांगी। कचेड़ी आदि शक्ति का सतलुज शिखर शैली का मंदिर कचेड़ी गांव के समीप है। माता का भण्डार कचेड़ी गांव में है। माता शमशानवासिनी है। मंदिर के गर्भ गृह में माता की चतुर्भुज प्रस्तर प्रतिमा है। माता के कचेड़ी में प्राकट्य के विषय में मान्यता है कि जब माता तुम्बी के फटने से टिक्कर शिखर पर लिंग रूप में स्थापित हुई तो माता के प्रकोप से  यहां के स्थानीय मवाना भूरिया को भारी कष्ट होने लगा। ब्राह्मण के कहने पर मवाना भूरिया ने कुंआरी कन्याओं को जागृत किया कि किसलिए उस पर कष्ट आ गए हैं। एक लड़की में माता ने प्रवेश कर कहा कि मैं टिक्कर शिखर पर लिंग रूप में स्थित हूं, जबकि मेरी एक बहिन कण्डा (हाटू) और एक बहिन मुण्डा (सतलुज के पास) खेगसू में रहती है।
मवाना ने देवी से मांफी मांगी कि उसे माता की उपस्थिति के बारे में जानकारी नहीं थी। वह लड़की आवेश में टिक्कर पहुंची और उस स्थान को इंगित किया जहां देवी पिंडी रूप में स्थापित थी। यहीं पर देवी का मंदिर स्थापित किया जिसे मातृ देवरी कहा जाता है।


कुमारसैन के प्रथम शासक कीर्ति सिंह ने माता कचेड़ी को कोटेश्वर महादेव की बहिन स्वीकार किया था। माता कचेड़ी के मंदिर में राणा के परिवार का जडोलण अर्थात् केश काटने का संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इस अवसर पर राणा व रानी स्वयम् देवी के मंदिर में पधारते थे। जब नया शासक गद्दी पर आसीन होता तो राणा सपरिवार देवी के मंदिर में आयोजित ज्वाला जातर में शामिल होता था। यहां हर तीसरे वर्ष भैसे की बलि देने की परम्परा रही है। ऐसी भी मान्यता है कि माता वास्तविक रूप में सदैव मढोली में अपने भाई के साथ रहती है। बैनू और भूरी माता के दो भोर अर्थात् गण हैं। आदिशक्ति कचेड़ी अपने भाई कोटेश्वर महादेव की चार वर्ष में एक बार आयोजित चार रथी यात्रा में महादेव के रथ को मढोली से श्रैम्बल नामक स्थान तक नेतृत्व करती है। यहीं पर भाई-बहिन का तुम्बी फटने से प्राकट्य हुआ था। आदि शक्ति के मंदिर में चार वर्ष में एक बार पूजा का विशाल आयोजन होता है। इस अवसर पर देवी के भाई कोटेश्वर महादेव भी पूरी प्रजा के साथ पधारते हैं। कचेड़ी के समीप भाई बहिन का भावप्रवण मिलन होता है। सावन महीने में देवी एक दिन सैर के लिए राम चाईक परिवार के घर रात्रि प्रवास करती है। कचेड़ी घमाना के निवासी अनिल रामचाईक के अनुसार रामचाईक परिवार के माध्यम से माता ने स्वम् को प्रकट कर यहां प्रतिष्ठित किया था।
देवी दिवाली व बल्टी पर्व पर ही रथारूढ़ होकर मंदिर से निकलती है। एक अन्य अनूठी परम्परा यह है कि देवी यात्रा पर केवल रात्रि में निकलती है। आदि शक्ति कुमारसैन व बुशैहर क्षेत्र में प्रतिष्ठित सात देवियों में एक मानी जाती है। यह देवियां बुशैहर के सराहन में भीमाकाली, छिछड़ के शिखर पर देरठू माता, डिगाधार दुर्गा, लाठी के समीपस्थ लठाड़ी माती, हाटू की कालिका और बाहरी सिराज के खेखसू की कसुम्भा देवी के रूप में आज भी प्रतिष्ठित हैं। कुमारसैन में हर गांव व क्षेत्र में देवी के अनेक मंदिर हैं, जहां नवरात्रों में भारी भीड़ रहती है। चेकुल में भगवती ज्वाला मंदिर, बड़ागांव सांगरी में ब्रह्मेश्वर देव के साथ जगोड़ी नामक स्थान पर काली मंदिर, कचीन घाटी में हाटू कालका मंदिर व अन्य देवी मंदिर उपासना के केन्द्र हैं, जहां लोग अपने दैहिक व दैविक तापों के हरण के लिए शीष नवाते हैं।
साहित्यकार कुमारसैन जिला शिमला हिमाचल प्रदेश

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