मेरा वजूद

मनमोहन शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

तलाशता हूँ
अपने ही वजूद को
घनघोर वन में
गुम सुई की तरह
चल रहा था मुद्दत से
वो साथ मेरे
और मैं
उसकी परछाई की तरह

मुखौटे लिए फिरते
वाशिंदो के शहर में
कौन किसे पहचान सका?

कभी इस वेश में
कभी उस भेष में
राग वश कभी द्वेष में
छीनते चले सब
मुझसे मेरा वजूद
और मैं खो बैठा
अपनी ही पहचान
आईने में

मेरे आसपास पड़े हैं
ढेरों बेजान मुखौटे
लूटाता रहा खुद को
खुद ही से मैं
जिनकी भाव भंगिमाओं पर
और तलाश रहा हूँ
लुट चुके खुद के वजूद को
बेजान पड़े मुखौटों के ढेर में

कुसुम्पटी शिमला-9, हिमाचल प्रदेश

Related posts

Leave a Comment