निःस्वार्थ सेवा

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

दुनिया में सभी लोग कुछ न कुछ सेवा करते हैं, लेकिन अधिकतर लोग सेवा के बदले कुछ न कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन भाग्यशाली वह हैं, जो निःस्वार्थ भाव से जरूरतमन्दों की सेवा करते हैं और मानवता की मिशाल बनते हैं। एक राज्य में ऐसा ही एक मंत्री था, जो लोगों की निःस्वार्थ सेवा करता था। एक दुर्घटना में मंत्री की आँखों की रोशनी चली गई। राजा ने उसे आराम के लिए मंत्रीपरिषद से विदाई दे दी। कुछ दिन बाद एक दूसरे राज्य के राजा ने राजा के पास एक पत्र और सुरमें की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूँ, इसे लगाने से अन्धापन दूर हो जाता है। राजा सोंच में पड़ गये कि इस सुरमें को किस-किस को दूँ, क्योंकि राज्य में अन्धों की संख्या बहुत थी।
राजा को अचानक अपने नेत्रहीन मंत्री की याद आई। उन्होंने उसे बुलाया और उसे सूरमें की डिबिया देते हुए कहा-इस सुरमें को आँखों में डालें तुम्हारी रोशनी लौट आयेगी। मंत्री ने अपनी आँखों में सुरमा लगाया तो उसको सब दिखाई देने लगा। फिर उसने बचा खुचा सुरमा अपनी जीभ पर लगा दिया। यह देखकर राजा चकित रह गये, उन्होंने पूछा-यह क्या किया?
मंत्री ने कहा-महाराज! आप चिन्ता न करें! मैनें चखकर जान लिया है कि सुरमा किस चीज़ से बना है। अब मैं स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बाटूँगा और उनकी दुनिया रोशन करूँगा। जिस तरह निःस्वार्थभाव से उन राजा साहब ने सुरमा भिजवाकर और आपने मुझे देकर मेरी अंधेरी दुनिया फिर रौशन की है। मैं भी अब अपना पूरा समय जनसेवा में लगाऊँगा।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

Related posts

Leave a Comment