अर्पण और समर्पण

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक बार गुजरात की रियासत की एक रानी मीलण देवी ने भगवान सोमनाथ जी का विधिवत अभिषेक किया। उन्होंने सोने का तुलादान कर उसे सोमनाथ जी को अर्पित कर दिया। सोने का तुलादान कर उनके मन में अहंकार भर गया। वह सोचने लगी कि आजतक किसी ने भी भगवान का स्वर्ण तुलादान नहीं किया होगा। एक रात भगवान सोमनाथ के उनको दर्शन हुए। भगवान ने उनसे कहा-मेरे मन्दिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके पास संचित पुण्य असीमित हैं। उनमें से कुछ पुण्य तुम उसे सोने की मुद्रायें देकर खरीद लो। लोक परलोक में तुम्हारे काम आयेंगे। नींद टूटते ही रानी बेचैन हो गईं। उन्होंने अपने कर्मचारियों काे मन्दिर से उस महिला को राजभमवन लाने के लिए कहा। कर्मचारी मन्दिर पहुँचकर उस महिला को पकड़ कर ले आये। वह बेचारी डर के मारे थर-थर काँप रही थी। रानी ने उस महिला से कहा-तुम अपने संचित पूण्य मुझे दे दो, उसके बदले तुम्हें सोने की मुद्राएं दूँगी। डरते हुए वह गरीब महिला बोली-महारानी जी! मुझ गरीब से भलखपुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं। मैं तो खुद दर दर भींख माँगती हूँ। भीख से मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी।
      कल मन्दिर में दर्शन करने से पहले किसी ने एक मुठ्ठी सत्तू दिये थे, उसमें से आधे सत्तू से भगवान सोमेश्वर का भोग लगाया और बाकी सत्तू बाहर एक दिनभूखे भिखारी को खिला दिये। महरानी साहबा! जब मैं भगवान को ठीक से प्रसाद ही नहीं चढा़ सकती तो मुझे पुण्य कहाँ से मिलेगा? गरीब महिला की बात सुनकर रानी का घमण्ड टूट गया। वह समझ गईं कि निस्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमेश्वर ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किये हैं। वह समझ चुकी थी कि पूर्ण समर्पण सहित, अहंकार रहित, स्वार्थ रहित दीन दुखियों की सेवा ही असली सेवा है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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