सर्प दंश से मुक्ति प्रदान करते है मरोड़ा के माहूंनाग

डा. हिमेन्द्र बाली हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले की तहसील करसोग के दक्षिण-पूर्व में वैदिक नदी सतलुज के दायें तट पर स्थित मरोड़ा गांव में नाग अधिपति माहूंनाग का शिखर शैली का मंदिर अवस्थित है। माहूंनाग महाभारत के महारथी सूर्यपुत्र महादानी कर्ण के अवतार हैं। कुंती के ज्येष्ठपुत्र कर्ण जब अपने अनुज अर्जुन के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए तो श्रीकृष्ण ने पाण्डवपुत्रों को कर्ण के उनके सहोदर होने का रहस्योद्घाटन किया था। शोक संतप्त पाण्डवों ने अपने अग्रज का अंतिम संस्कार सतलुज और वैदिक सरितायें-इमला-बिमला से आविर्भूत करसोग सरिता के संगम स्थल पर किया था। तभी चिता की राख से एक नाग प्रकट हुआ और उसने पाण्डवों को सम्बोधित किया था कि मैं तुम्हारा अग्रज कर्ण हूं। मेरा जन्म नाग कुल में हुआ है। तभी आकाशीय विद्युत ऊंचे शिखर पर देवदार के वृक्ष पर गिरी और नाग कुलोत्पन्न कर्ण ने कहा कि मेरा मंदिर इस आकाशीय विद्युत के गिरने वाले स्थान पर करो। यह आकाशीय ऊर्जा अखण्ड रूप में प्रज्ज्वलित रहे। पाण्डवों ने नाग रूप में अवतरित अपने अग्रज के आदेशानुसार सतलुज उपत्यका में बैड़ी धार-बखारी में प्रकट लिंग रूप नाग को प्रतिष्ठित किया था। आज भी बैड़ी धार में नाग अधिपति लिंग रूप में स्थित हैं।
सतलुज व करसोग सरिता के संगम के समीप मगाण  में एक ऐसा स्थान है, जहां माहूंनाग का प्रशिक्षु गूर सतलुज के गहरे पानी में छलांग लगाकर नदी के तल से सूखी रेत मुट्ठी में भर कर बाहर लाता है। मगाण में एक चट्टान है, जिसे नाग की जान कहते हैं जिस पर खड़े होकर आवेशित गूर सतलुज के गहरे जल में छलांग लगाता है। मरोड़ा में सुकेत में प्रतिष्ठित आचार्य द्रौण रूप देव बड़ेयोगी का खुण्डा अर्थात् सीमा है। देव बड़ेयोगी के अधीनस्थ द्वारपाल बाण के गूर महेन्द्र कुमार निवासी तलैण का कहना है कि सुकेत व भज्जी के सतलुज तटीय क्षेत्र में सांप के विष का शमन करने के लिए देव बड़ेयोगी ने मरोड़ा का क्षेत्र अपने शिष्य माहूंनाग को दिया था। यहां माहूंनाग का शिखर शैली का मंदिर है। साथ ही देव बड़योगी भी यहां प्रतिष्ठित हैं। मार्गशीर्ष मास की अमावस्या मंगरौड़ी अर्थात् बूढ़ी दिवाली से सात दिन बाद मरोड़ा में देव बड़ेयोगी और माहूंनाग  रथारूढ़ होकर मरोडा़ में जातर उत्सव में शामिल होते हैं। दो दिवसीय इस देवोत्सव में शिमला और मण्डी के हजारों लोग शामिल होते हैं।
मरोड़ा में सर्प दंश के निमित्त ग्रामीणों के सामूहिक अर्चन परम्परा आज भी प्रचलन है। जैसे ही किसी गांव में सर्प दंश की घटना घटित होती है तो पीड़ित व्यक्ति के परिजन आवाज देकर या अन्य माध्यम से मरोड़ा सूचना पहुंचाते हैं। घटना की गम्भीरता को देखते हुए सभी मरोड़ा के ग्रामीण माहूंनाग मदिर के समीपस्थ पीपल वृक्ष के नीचे एकत्रित होकर समवेत स्वर में पीड़ित व्यक्ति का नाम व पता उच्चरित कर उसके विष को हरण करने की विनती करते हैं और कुछ ही क्षणों में पीपल का पत्ता वृक्ष से जमीन पर गिरता है। इस अलौकिक घटना को दैवीय कृपा मानकर यह समझा जाता है कि माहूंनाग ने अमुक विष पीड़ित के विष हरण की पुकार सुन ली है। इस घटना की सूचना गांववासी पीड़ित व्यक्ति तक प्रेषित करते हैं। नाग के प्रताप से पीडि़त का विष दूर हो जाता है। मरोड़ा के ग्रामीणों के द्वारा इस दैवीय परम्परा का अनुशीलन आज के भौतिक युग की अनोखी मिसाल है। देव शक्ति के प्रति कर्तव्य और समाज के प्रति उत्तरदायित्य की इस परम्परा के पीछे लोगों की संवेदना परिलक्षित होती है। सुकेत के सशक्त नाग माहूंनाग की सारे प्रदेश में सर्प दंश निवारण और संतति सुख के लिए बड़ी मान्यता है।
इतिहासविद व साहित्यकार कुमारसैन शिमला हिमाचल प्रदेश 

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