तेरी नज़र

नरेन्द्र कुमार शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

छलकता रहा जाम तेरी नज़र का, मैं पी भी न सका।
फटी सी रही नज़र मेरी, पर मैं सी भी न सका।।
तेरी नज़र के साए में में शाम हो गई, मैं फिर भी न रुका।
कशिश थी तेरी नज़र की ऐसी, कि मैं तनिक भी न झुका।।
ज़ालिम, कमबख्त ज़माना भी हंसा, मुझसे ये हरारत क्या हुई।
बेपनाह, बेपरवाह था मैं इस सबसे, कि हाथों ने तेरी नज़र तक न छुई।।
तेरी नज़र के दीदार एक मौका और मिले, मैं ऐसा भी चाह न सका।
वो क्षण वो पल, फ़िर ऐसा समय फिर मिले, मैं ये बता भी न सका।।

शिमला हिमाचल प्रदेश 

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