प्रकृति से छेड़छाड़

पेड़ – पौधों
जंगल – पहाड़
नदी – नालों से
सुशोभित होती है प्रकृति
पर्यावरण को प्रदूषित
प्रकृतिक संसाधनों के
बेहिसाब दोहन
और पिछली आपदाओं की
अनदेखी का ही परिणाम है
चमोली जैसी विपदा को
न्योता देती
देवभूमि उत्तराखण्ड की
हो रही यह जल त्रासदी।
विकास की अंधी दौड़ में
नदियों को रोकना
प्रकृति के दोहन की कीमत पर
विकास का राग अलापना
बढ़ते तापमान से ग्लेशियरों पर
दी जानेवाली चेतावनी
को नहीं मानना
का ही यह परिणाम है
हो रही भीषण जल त्रासदी।
‘राजनीति अर्थशास्त्र’ की
चिंता करने वाले
राजनेताओं
नौकरशाहों और
पूंजीपतियों का गठजोड़
जनआंदोलनों से बेपरवाह होकर
पर्यावरणीय खतरे की
चेतावनियों को नजरअंदाज
करने का ही प्रतिफल है
यह जल त्रासदी।
अनदेखी से हो रही है तबाही
इसपर चिंतन है जरूरी
फिर यह कैसी मजबूरी ?
कल केदारनाथ में हुआ
आज हुआ है यहाँ  !
न जाने फिर कब हो जाए
जहाँ तहॉं !!

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