ढोंग

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक पंडित जी महराज लोगों के बीच धुंआधार तरीके से क्रोध न करने पर भाषण दे रहे थे। वो समझा रह थे कि क्रोध आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है, क्रोध से आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है और जिस आदमी में बुद्धि नहीं रहती, वह पशु बन जाता है। लोग बाग बड़ी श्रद्धा से पंडत जी का उपदेश सुन रहे थे। वो बता रहे थे कि क्रोध चाण्डाल होता है, उससे हमेशा बच के रहो। भीड़ में एक ओर एक जमादार बैठा था, जिसे पंडत जी अक्सर सड़क पर झाडू लगाते हुए देखा करते थे। जमांदार भी उनकी बातों से बहुत प्रभावित हुआ, उसने मन ही मन तय किया कि वह रोज़ पंडत जी का प्रवचन सुनने आया.करेगा।
अपना उपदेश समाप्त करके पंडत जी जल्द से जल्द निकलना चाह रहे थे। उन्हें एक अमीर यज़़मान के घर स्वादिष्ट भोजन के लिये जाना था। जमांदार भी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।लोगों की भक्ति-भावना से फूले हुए पंडत जी भीड़ में से निकल ही रहे थे, कि इतने में पंडत जी का पांव खुद की धोती में उलझ गया और वह गिरते गिरते जमांदार से जा टकराये। फिर क्या था उनका पारा चढ़ गया, बोले-दुष्ट! तू कहां से आ मरा? मैं भोजन करने जा रहा था, तूने मुझे छूकर अपवित्र कर दिया। अब मुझे फिर स्नान करना पड़ेगा।  उसने जमादार को जी भरके गालियाँ दीं।
पास में ही गगा नदी थी, लाचार होकर पंडत जी उसी ओर लपके। तभी उन्होंने देखा कि जमांदार उनसे भी तेज आगे आगे चला जा रहा है। पहले से ही क्रोध में भरे पंडत जी ने कड़क पूछा-क्यों रे जमादार के बच्चे! तू मेरे आगे-आगे कहाँ जा रहा है? जमांदार बोला-नदी में नहाने। अभी कुछ देर पहले आपने कहा था कि क्रोध चाण्डाल होता है और मैं उस चाण्डाल को छू गया, इसीलिये मुझे नहाना पडे़गा। पंडत जी को जैसे काठ मार गया हो, वे जड़वत खडे रह गये। उनके मुँह से एक भी शब्द न निकला। वह बस जाते हुए जमांदार का मुँह देखते रह गये।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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