खेत खलिहान और फसलों की रनक्षक हैं वन देवी

डा. हिमेद्र बाली “हिम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश मानव सृष्टि का उद्गम रहा है। हिमालय के इसी क्षेत्र में सृष्टि के बाद संस्कृति का सूत्रपात हुआ। प्रदेश में वैदिक देव समुदाय के अतिरिक्त आदिम देव परम्परा का प्रचलन आज भी हैं। यही कारण है कि आज भी यहां वैदिक देवी-देवताओं के अतिरिक्त अरण्य देवी, यक्ष, गंधर्व व योगनियों आदि की पूजा पद्धति की परम्परा प्रचलित हैं। शिमला जिले की कुमारसैन तहसील के अन्तर्गत जंजैली पंचायत के चेकुल गांव में मां ज्वाला जी स्थान अधिपति कोटेश्वर महादेव के क्षेत्र में प्रतिष्ठित है। यहीं आदि शक्ति के अधीन क्षेत्र की संरक्षक  वन देवी के चबूतरे प्रस्तर विग्रह के साथ स्थापित हैं। चेकुल में बाली बिरादरी ने  सम्वत् 1939 तदानुसार 1881 ई. में ज्वाला देवी को प्रतिष्ठित किया था। यहीं चेकुल में एक खेत की मेंड पर कंटीली झाड़ी के नीचे अरण्य देवी स्थापित है। मंदिर के पुजारी नरेश बाली के अनुसार देवी की नित्य दोनों पहर पूजा ज्वाला देवी के मंदिर से ही होती है। भाद्रपद महीने में देव पर्दे में साधनारत रहते हैं और द्वेषी शक्तियों से रक्षा के लिए सांय प्रत्येक मंदिर में घी के दीये “सदीऊए” पूरे महीने जलाए जाते हैं। इस महीने वन देवी के पूजा स्थल पर भी सांय घी का दीपक जलाया जाता है। चैत्र और अश्विन मास के नवरात्रे में अष्टमी में मीठी रोटी “रोट” को अर्पित किया जाता है।
नरेश बाली के अनुसार पूर्व में बिरादरी के लोग आखेट से पूर्व हथियारों की अरण्य देवी के मंदिर में पूजा करते थे। अरण्य देवी को काली का रूप माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि अरण्य देवी जंगली जानवरों से फसलों से रक्षा करती है और प्राकृतिक आपदाओं व रोगों से रक्षा करती है। यह देवी हिंसक जानवरों से भी रक्षा करती है। चेकुल के अतिरिक्त साथ लगते भवारा गांव में भी अरण्य देवी की पूजा खेत में स्थापित थड़े पर की जाती है। हिमाचल के लोकमानस में देवाश्रित सामाजिक व्यवस्था की परिपाटी आदि काल से चली आ रही है। दैवीय शक्तियों के प्रति लोक मान्यतायें ही यहां की संस्कृति को जीवित रखे हुए है। चेकुल में अरण्य देवी काली के प्रति आस्था से यहा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के दिग्दर्शन होते हैं।

इतिहासकार व साहित्कार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश 

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