पुष्प और सौन्दर्य

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

जंगल में एक पेड़ के नीचे एक वृद्ध संत ने अपनी छोटी सी कुटिया बनाई हुई थी, जिसके चारों ओर हरी घास का मैदान था और इसमें सैकड़ों सफेद गुलाब के फूल खिले हुए थे। संत अपने एक युवा शिष्य के साथ बैठे हुए थे। वह युवक अविवाहित था और अक्सर गुरु के पास सत्संग के लिए आता रहता था। उसे यहां आकर मन को असीम शांति का अहसास होता था, लेकिन आजकल उसके मन में एक बात चल रही थी, जिसे वह अपने गुरु से बांटना चाहता था। अतः एक दिन अध्यात्म और धर्म चर्चा के बाद उस युवक ने विषय बदलकर गुरु से पूछा-महाराज! आफ जानते ही हैं कि मेरा अध्ययन पूरा हो गयाहै, मैंने अपने पिता का व्यवसाय संभाल लिया है और इन दिनों मेरे विवाह की बात चल रही है, लेकिन कई युवतियों को देख कर भी मैं अपने लिए कोई योग्य जीवन साथी नहीं तलाश सका। कृपया आप ही बताएं कि मैं क्या करूं? सारा संशय समझकर गुरुजी बोले-बेटा! तुम एक काम करो। मैदान के अंतिम छोर तक एक चक्कर लगाओ, जो गुलाब का फूल तुम्हें सबसे सुंदर लगे। वह मेरे लिए तोड़ कर ले आओ। बस एक शर्त है कि आगे बढ़ा कदम पीछे नहीं मुड़ना चाहिए। युवक ने सहमति में सिर हिलाया और चला गया, लेकिन थोड़ी देर बाद ही वह खाली हाथ लौट आया। गुरु ने पूछा-तुम कोई फूल नहीं लाए ? तो उसने जवाब दिया-गुरुजी! मैं एक के बाद एक फूल देखता हुआ आगे बढ़ता गया। जो कोई सुंदर फूल देख उसे तोड़ने के लिए झुकता, तो मेरे मन में यह ख्याल आता कि हो सकता है कि इससे आगे और बेहतर फूल हो। मैदान के अंत में मुझे कुछ सुंदर फूल दिखे, लेकिन पास जाकर देखा तो मुरझाए हुए थे। उन्हें लाने की मेरी इच्छा नहीं हुई, इसलिए मैं खाली हाथ लौट आया। गुरु ने कहा-बेटा! जिंदगी भी ऐसी ही है, यदि सबसे योग्य और सुंदर ढूंढने में लगे रहोगे, तो अंत में तुम्हारे हाथ मुरझाये फूल ही आएंगे। युवक गुरु का सारा इशारा समझ गया और उन्हें हाथ जोड़ प्रणामकर वह अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ गया।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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