बसंत 

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

खग करते कलरव मनभावन,
मौसम ऋतु बसंत का आया पावन ।
बौर लदे झरवेरी और आम की डाली-डाली,
खेतों में फैली दूर तलक मखमल सी हरियाली ।
बागों में महक रहे चंपा, चमेली, गेंदा, गुलाब,
नीला-नीला आसमान हो रहा खुली किताब ।
पीली-पीली सरसों फूली, योवनता चहुंओर,
ज्ञान की ज्योति जगाओ रे साथी, हो गई भोर ।
बसंती हवा सर-सर-सरर करती देती संदेश,
आपस में मिलकर प्यार की ज्योति जलाओ, कहता ‘मुकेश’ ।
मोर-मोरनी करें नृत्य, तितलियां पुष्पों से इठलातीं,
कोमल-कोमल, प्यारी-प्यारी शक्लें भला किसे न भातीं ।
गेहूं की बालियां झूम-झूम कर गीत मनोहर गातीं,
भंवरों की मीठी-मीठी तानें, मन सबका हर लेतीं ।
ओ रे आलसी जन ! तू अब तक क्यों सोया पड़ा,
एक नई सुबह का कर आलिंगन, चल हो जा खड़ा ।
देती दस्तक बसंत द्वार पर, साथी करो स्वागतम,
मातु शारदे का वंदन-अभिनंदन, मिटे सर्व तम ।
ग्राम रिहावली, डाक तारौली गुर्जर फतेहाबाद, आगरा

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