शिवपुराण से……. (277) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

भगवान् शिव का कैलास पर्वत पर गमन तथा सृष्टिखण्ड़ का उपसंहार

गतांक से आगे………..

उन्हीं के रूप में मैं कुबेर का मित्र बनकर उसी पर्वत पर विलासपूर्वक रहूंगा और बड़ा भारी तप करूंगा।
शिव की इस इच्छा का चिन्तन करके उन रूद्र देव ने कैलास जाने के लिए उत्सुक हो अपनी उत्तम गति देने वाले एवं नादस्वरूप डमरू को बजाया। डमरू की वह ध्वनि, जो उत्साह बढ़ाने वाली थी, तीनों लोकों में व्याप्त हो गयी। उसका विचित्र एवं गम्भीर शब्द आहवान की गति से युक्त था, अर्थात सुनने वालों को अपने पास आने के लिए प्रेरणा दे रहा था। उस ध्वनि को सुनकर मैं तथा विष्णु आदि सभी देवता, ऋषि, मूर्तिमान् आगम, निगम और सिद्ध वहां आ पहुंचे। देवता और असुर आदि सब लोग बड़े उत्साह में भरकर वहां आये। भगवान् शिव के समस्त पार्षद तथा सर्वलोक वन्दित महाभाग गणपाल जहां कहीं भी थे, वहां से आ गये।
इतना कहकर ब्रह्माजी ने वहां आये हुए गणपालों का नामोल्लेखपूर्वक विस्तृत परिचय दिया, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया। वे बोले-वहां असंख्य महाबली गणपाल पधारे। वे सब के सब सहस्रों भुजाओं से युक्त थे और मस्तक पर जटा का ही मुकुट धारण किये हुए थे। सभी चन्द्रचूड़, नीलकण्ठ और त्रिलोचन थे। हार, कुण्डल, केयूर तथा मुकुट आदि से अलंकृत थे। वे मेरे, श्रीविष्णु के तथा इन्द्र के समान तेजस्वी जान पड़ते थे। अणिमा आदि आठों सिद्धियों से घिरे थे तथा करोड़ों सूर्यों के समान उद्भासित हो रहे थे।

(शेष आगामी अंक में)

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