शिवपुराण से……. (276) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

गतांक से आगे………..

इस प्रकार वर देकर भगवान् शिव ने पार्वतीदेवी से फिर कहा-देवेश्वरी! इसपर कृपा करो। तपस्विनी! यह तुम्हारा पुत्र है। भगवान् शंकर का यह कथन सुनकर जगदम्बा पार्वती ने प्रसन्नचित्त हो यज्ञदत्त कुमार से कहा-वत्स! भगवान् शिव में तुम्हारी सदा निर्मल भक्ति बनी रहे। तुम्हारी बांयी आंख तो फूट ही गयी, इसलिए एक ही पिंगलनेत्र से युक्त रहो। महादेवजी ने जो वर दिये हैं, वे सब उसी रूप में तुम्हें सुलभ हों। बेटा! मेरे रूप के प्रति ईष्र्या करने के कारण तुम कुबेर नाम से प्रसिद्ध होओगे। इस प्रकार कुबेर को वर देकर भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवी के साथ अपने विश्वेश्वर धाम में चले गये। इस तरह कुबेर ने भगवान् शंकर की मैत्री प्राप्त की और अलकापुरी के पास जो कैलास पर्वत है, वह भगवान् शंकर का निवास हो गया।

भगवान् शिव का कैलास पर्वत पर गमन तथा सृष्टिखण्ड़ का उपसंहार

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! मुने! कुबेर के तपोबल से भगवान् शिव का जिस प्रकार पर्वत श्रेष्ठ कैलास पर शुभागमन हुआ, वह प्रसंग सुनो। कुबेर को वर देने वाले विश्वेश्वर शिव जब उन्हें निधिपति होने का वर देकर अपने उत्तम स्थान को चले गये, तब उन्होंने मन ही मन इस प्रकार विचार किया-ब्रह्माजी के ललाट से जिनका प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो प्रलय का कार्य सम्भालते हैं, वे रूद्र मेरे पूर्ण रूप हैं। अतः उन्हीं रूप में गुह्यकों के निवास स्थान कैलास पर्वत को जाऊंगा।

(शेष आगामी अंक में)

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