शिवपुराण से……. (275) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

गतांक से आगे………..

इसने ऐसा कौन सा तप किया है, जो मेरी भी तपस्या से बढ़ गया है। यह रूप, यह प्रेम, यह सौभाग्य और यह असीम शोभा-सभी अद्भुत हैं। वह ब्राह्मण कुमार बार-बार यही कहने लगा। जब बार-बार यही कहता हुआ वह क्रूर दृष्टि से उनकी ओर देखने लगा, तब वामा के अवलोकन से उसकी बायीं आंख फूट गयी। तदन्तर देवी पार्वती ने महादेव जी से कहा-प्रभो! यह दुष्ट तपस्वी बार-बार मेरी ओर देखकर क्या बक रहा है? आप मेरी तपस्या के तेज को प्रकट कीजिये। देवी की यह बात सुनकर भगवान् शिव ने उनसे हंसते हुए कहा-उमे! यह तुम्हारा पुत्र है। यह तुम्हें क्रूर दृष्टि से नहीं देखता, अपितु तुम्हारी तपः सम्पत्ति का वर्णन कर रहा है। देवी से ऐसा कहकर भगवान् शिव पुनः उस ब्राह्मणकुमार से बोले-वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से संतुष्ट होकर तुम्हें वर देता हूं। तुम निधियों के स्वामी और गुह्यकों के राजा हो जाओ। सुव्रत! यक्षों, किन्नरों और राजाओं के भी राजा होकर पुण्यजनों के पालक और सबके लिए धन के दाता बनों। मेरे साथ तुम्हारी सदा मैत्री बनी रहेगी और मैं नित्य तुम्हारे निकट निवास करूंगा। मित्र! तुम्हारी प्रीति बढ़ाने के लिए मैं अलका के पास ही रहूंगा। आओ, इन उमादेवी के चरणों में साष्टांग प्रणाम करो, क्योंकि ये तुम्हारी माता हैं। महाभक्त यज्ञदत्त कुमार! तुम अत्यन्त प्रसन्नचित्त से इनके चरणों में गिर जाओ।
ब्रह्माजी कहते हैं- नारद!

(शेष आगामी अंक में)

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