संगत और दीक्षा

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

संसार में हर एक गुरू अपने समीप के व्यक्ति को अपने तरीके से शिक्षा प्रदान करते हैं। ऐसे ही एक यहूदी संत सिम्शा बुनेन अपने ही ढंग से लोगों को शिक्षित करने के लिए प्रख्यात थे। उनके पास पड़ोस में एक  दुराचारी व्यक्ति हर अच्छे काम का विरोधी था। संत ने सोंचा ,क्यों न इसे भी अपने तरीके से सुधारा जाय। संत को पता चला कि वह दुराचारी व्यक्ति शतरंज का शौकीन है। एक दिन ऊन्होंने उसे शतरंज खेलने के लिए आमंत्रित किया। खेल के दौरान सिम्शा ने जानबूझकर गलत चाल चली। जब वह व्यक्ति उनके मोहरे मारने लगा तो माफ कीजिएगा, कहकर वे मोहरे वापस लेने लगे। उस व्यक्ति ने कोई आपत्ति नहीं की और चाल वापस लेने दी। थोड़ी देर बाद सिम्शा बुनेन ने पुनः गलत चाल चली और माँफी मांगते हुए अपनी चाल वापस लेनी चाही, लेकिन इस बार वह व्यक्ति नाराज हो उठा और बोला-मैंने एक बार मोहरा वापस लेने क्या दिया कि आप तो बार-बार चाल वापस लेना चाहते हो। इस बार मैं चाल वापस नहीं लेने दूँगा।
तब सिम्शा ने उससे हँसकर कहा-भाई! तुम तो खेल में मेरी दूसरी गलत चाल वापस लेने को राजी़ नहीं हो, परन्तु अपनी जिन्दगी में बार बार गलत चालें चलना चाहते हो और सोंचते हो कि भगवान तुम्हें हमेशा नजर अन्दाज करते रहें ? देखो! अगर हमें दुनिया में रहना है तो बुरे कर्मों को त्यागकर, स्वयं को अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए। अपने अहम में मस्त उस व्यक्ति ने संत की बातों पर तवज्जो नहीं दी, लेकिन खेल खत्म होने के बाद जब वह व्यक्ति अपने घर गया तो रात को सोते समय उसको संत की बातें याद आईं। उसे महसूस हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है। दूसरे दिन वह संत के पास गया, उनसे माफी मांगी और फिर दीक्षा ली। संत ने बड़ी सरलता से उसका जीवन भदल दिया। जीवन की भूलभुलैया के अंधेरों में हमें भटकने से बचाते हैं गुरुजन और संत पुरुष।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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