मानव उत्पत्ति और अराजकता

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

यह सर्वविदित सत्य है कि इन्सान की उत्पत्ति से लेकर आज विज्ञान युग तक आने के बावजूद वह अपने अन्दर के जानवर से कभी मुक्ति नहीं पा सका है। कभी पेट भरने के लिए, कभी धर्म स्थापना और कभी देशों को जीतने के नाम पर वह हिन्सा का ताण्डव करता रहा है। वैसे तो वास्तविक क्रांतिकारी हमेशा मौलिक होता है। वह दूसरों पर गुस्सा उतारने या गाली गलौज से पहले खुद को बदलने की कोशिश करता है, लेकिन मुश्किल यह है कि ज्यादातर बदलाव करने वाले लोग चीजों को बहुत सामान्य तरीके से देखते हैं। इसी कारण इच्छित बदलाव सम्भव नहीं हो पाता।
विडम्बना यह है कि आज हर समाज अपनी रिय देने या उसे थोपनें की कोशिश ज्यादा करता है। दुनिया भर के विचारों के आदान-प्रदान में उसे कोई रुचि नहीं है। इसके उलट वह अपनी एकतरफा सोंच को आगे बढ़ाकर अनन्तकाल तक अपना अस्तित्व बनाये रखने का झूठा भ्रम पाले हुए है। चाहें भविष्य कितना ही अंधकारमम क्यों न हो। जब इस तरह का पाखण्ड हमारा चरित्र बन जाता है, तब यह हमारी सोंच को भी प्रभावित करता है, क्योंकि वह हर चीज में नकरात्मकता देखता है और  वास्तविकता के हर पहलू से असहमत होता है।
शायद मनुष्य का यही इतिहास है। मनुष्य की सृष्टि और पृथ्वी पर मनुष्य की उपस्थित के अर्थ से सम्बंधित मिथकों का अध्ययन हमें यह बताता है कि हर संस्कृति से जुडा़ अधिकांश मनुष्य हमलावर है और उसने ब्रह्माण्ड के नियमों का उलंघन किया है या उन्हें तोडा़ है। अराजकता मनुष्य का स्थाई भाव है और वह तमाम संत महापुरुषों के उपदेशों और आग्रहों को दरकिनार कर विश्व शान्ति और मानवता के लिए खतरा बना हुआ है। हमारे तथाकथित शान्तप्रिय देश ने दूसरे देशों पर हमला न करके, अपने ही देश की अधिकांश जनता का सदियों से जातियता के नाम पर शोषण किया है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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