जीवन दायित्व

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

बुद्ध भगवान आम लोगों का विवेक जगाने के लिए उनके बीच आमंत्रण पर या बगैर आमंत्रण पर भी  पहुँचते थे। वह सभी का निमंत्रण निःसंकोच स्वीकार करते थे। एक बार एक किसान ने उन्हें अपने गाँव आने का निमंत्रण दिया। बुद्ध ने हामी भर दी और तय दिन समय पर वह गाँव पहुँच गये। चूँकि गाँव में पहले ही तथागत के आने का प्रचार हो चुका था, इसलिये सबने मिलकर प्रवचन की तैयारी कर रखी थी। बुद्ध ने अपना प्रवचन शुरू किया, लेकिन अचानक किसान का बैल बीमार हो गया। उसे बैल की सेवा में लगने पड़ा। वह उसके लिए जड़ी बूटी का प्रबंध करने लगा, साथ ही उसे प्रवचन में जाने की भी चिंता थी, लेकिन उसे प्रवचन सुनने से अधिक बैल की जान बचाना ज्यादा उचित लगा। उलझन के बावजूद वह अपने बैल की देखभाल में लगा रहा। इसका अच्छा असर हुआ और बैल की जान बच गई। बैल के इलाज के बाद वह प्रवचन सभा में पहुँच गया, लेकिन तब तक प्रवचन समाप्त हो चुका था। किसान को अंत में पहुँचता देख लोग बुद्ध से उसकी शिकायत करते हुए बोले-देखिये! यह कितना स्वार्थी है, आपके प्रवचन का आयोजन करके खुद ही गायब हो गया। इस पर किसान ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हुए बुद्ध को अपनी विपदा कह सुनाई। सारी बात सुनने के बाद बुद्ध बोले-इसने प्रवचन सुनने की जगह अपने दायित्व को महत्व देकर यह सिद्ध कर दिया कि वह मेरे विचार के मूल-तत्व को समझता है। यदि बैल मर जाता तो किसान का प्रवचन सुनना बेकार हो जाता, तब मेरे प्रवचन का कोई मूल्य न रह जाता।                ज्ञान प्राप्ति करने का अर्थ दायित्वों से भागना नहीं है, बल्कि उन्हें ढंग से समझना और उनका निर्वाह करना है। व्यक्ति को हर समय अपने विवेक और बुद्धि से ही कार्य करना चाहिए। उपस्थित सभी लोगों ने तथागत बुद्ध की बात को समझते हुए अपनी भूल पर क्षमा मांगी।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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