ज़िन्दगी से वाबस्ता भी नहीं और जुदा भी नहीं

डा हिमेंद्र बाली ‘हिम’, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

“ज़िन्दगी से वाबस्ता भी नहीं और जुदा भी नहीं। बिल्कुल वैसे ही होता है, जैसे यह कहना कि है भी और नहीं भी है। मतलब उपस्थित भी और अनुपस्थित भी। कमोबेश हम सब यही स्थिति में ज़िंदगी जीने को मज़बूर हैं। हम करना कुछ और चाहते हैं, लेकिन ज़िन्दगी कराती कुछ और है। हम जहाँ रहना चाहते हैं, वहाँ रह नहीं पाते, विस्थापित हो जाते हैं। हम जो कहना चाहते हैं, वह कह नहीं पाते, हम जो लिखना चाहते हैं, वह लिख नहीं पाते हैं, लेकिन लिखना छोड़ भी नहीं पाते हैं। हम कुछ रिश्ते जोड़ना चाहते हैं, उन्हें जोड़ भी नहीं पाते लेकिन तोड़ भी नहीं पाते हैं। मतलब यह द्वंद की स्थिति भी है और स्थगित करने वाली भी।
हम सब कहते हैं कि सब मोहमाया है, लेकिन माया को छोड़ भी नहीं पाते। राजनीति से नफ़रत करते हैं, लेकिन नेताओं के यहाँ लाइन लगाने से भी बाज़ नहीं आते हैं। वैसे राजनीति की परिभाषा ही यह है कि जिसका जो हक़ हो उसे मिले, जो जैसा डिज़र्व करता हो, उसको वैसा पद, पैसा और शोहरत मिले। जिस राजनीति को हम गंदी कहते हैं, वह गंदी राजनीति है और कुछ नहीं।
हम सब लोग अक्सर देश के प्रति चिंतित दिखाई देते हैं, लेकिन देश के लिए कुछ करने की चिंता नहीं करते हैं। जब चुनाव में नेता चुनने की बात आती है तो सोचते हैं, क्या फ़र्क़ पड़ता है, चाहे राम भरोसे जीते या बरखू राम, हमारी ज़िंदगी तो वैसे ही कटेगी, सुबह और शाम। अब जब महान कवि तुलसी बाबा कह गए हैं- कोउ नृप होय, हमे का हानी। तब फिर क्या करे जनता ?
एक्चुअली यह फिलॉसफी हमारे धार्मिक ग्रन्थों से ही निकली है शायद ? काम करो, लेकिन फल के प्रति उदासीन रहो। ज़िन्दगी जिओ, लेकिन ज़िन्दगी के प्रति उदासीन रहो। समाज मे भला-बुरा देखो, लेकिन उदासीन रहो। किसी की जेब काटी जा रही है, कोई बहन, बेटी छेड़ी जा रही है तो भी उदासीन रहो। अक्टूबर के महीने में भी मई, जून रहो। महीने बदले,साल बदले, लेकिन हम सब नहीं बदले। मतलब बदलाव के प्रति भी उदासीन रहो, जो होता है होने दो, कुछ न कहो । वैसे उदासीनता भी अच्छा गुण है।
बड़ी अजीब बात है कि जिससे जुदा होना चाहो वह और जुड़ता जाता है। जैसे किसी ने आपको कुछ कह दिया और आप हर्ट हो गए तो आप चाहोगे कि उसके बारे में बिल्कुल न सोचूँ, लेकिन वह आपके दिमाग़ में छाया रहेगा। दिमाग़ भी बड़ी जटिल मशीन है, जटिलतम से भी जटिल। कब क्या सोच ले, पता ही नहीं चलता है, लेकिन दिमाग़ होता है बड़ा कर्मशील। दिन-रात अपने काम मे लगा रहता है इधर से उधर बस भागा रहता है।  कभी इससे जुड़ता और कभी उससे जुदा होता है, कभी किसी को ख़ुदा बना लो और कभी ख़ुद ही ख़ुदा बन जाओ। वैसे सबसे अच्छा है कि न ज़िन्दगी से बहुत जुड़ा जाए और न जुदा हुआ जाए। ऑन और ऑफ होते रहा जाये। जितनी अधिक अनिश्चतता, उतनी ही अधिक निश्चितता और जितनी अधिक निश्चितता उतनी ही अधिक अनिश्चितता ।

मुख्य संपादक स्वर मदुला एवं अध्यक्ष सुकेत संस्कृति एवं जनकल्याण मंच कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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