तीनो कृषि कानून रद्द, अब आंदोलन काहे को

हिमानी पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।   

केन्द्र सरकार द्वारा लागू किये गये तीनों किसान बिलों के विरोध पर पंजाब, पश्चिमी यूपी व हरियाणा के किसानों में उबाल है, उनका धरना दो महिनों से अधिक समय से आज तक जारी है। किसान लगातार तीनों बिलों का वापिस लेने की मांग कर रहे थे, लेकिन विगत 11 दौर की वार्ता के बाद अब उनके रूख में कुछ नरमी आयी है और किसान संगठन सरकार से बात करके कोई रास्ता निकालने की बात करने लगे हैं, लेकिन जिस तरह से आंदोलन में विपक्षी पार्टियों की घुसपैठ हुई है, उससे लगता है कि आसानी से विवाद सुलझने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बावजूद इस विवाद को सुलझाने को दो बेहद कारगर फार्मूले भी अपनाये जा सकते हैं। अगर राजनीति की दृष्टि से देखें तो इन कानूनों को लागू करने का अधिकार राज्य सरकारों के अधीन कर दिया जाये। सर्वविदित है कि जहां सत्तासीन पार्टी की विपक्ष की सरकारे हैं, वहीं से किसान बिलों के विरोध के स्वर अधिक मुखर हैं, ऐसे में इन कानूनों को लागू करने का अधिकार राज्य सरकारों के अधीन करने से केन्द्र से दबाव कम हो जायेगा और राज्य सरकारों (मुख्य रूप से पंजाब सरकार) पर दबाव बढ़ेगा।
पहला कानून है कि किसान केवल एपीएमसी मंडियों में बेचने के लिए मजबूर नहीं होगा, जहाँ चाहे और जिसे चाहे बेच सकेगा। सरकार का कहना है कि किसान बिल 2020 का मुख्य उद्देश्य कृकृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य का सरलीकरण करना है, जिसके लिए केंद्र सरकार ने प्राइवेट सेक्टर को फसल खरीदने का अवसर प्रदान किया है। इस प्रकार किसान सरकारी मंडी के अलावा भी किसी और व्यक्ति के पास बेच सकता है। और किसानों की आय दोगुनी होने में सहायता प्राप्त हो सके। केंद्र सरकार का कहना है कि किसानों को देश में कहीं भी फसल बेचने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है, ताकि राज्यों के बीच कारोबार बढ़े। जिससे मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टिशन पर भी खर्च कम होगा।
किसान संगठनों का मानना है कि इस कानून के कारण कृषि क्षेत्र पर पूंजीपतियों का दबदबा बन जायेगा। इसका सीधा सा समाधान है कि जिन किसानों को यह स्वतंत्रता अच्छी नहीं लग रही है, वे तय कर सकते हैं कि हम तो एपीएमसी मंडी में जा कर उसी आढ़ती को अपनी फसल बेचेंगे, जिसे पहले बेचते रहे हैं। लो हो गया पहला कानून रद्द। अब आंदोलन काहे को

दूसरा कानून है कि किसान फसल रोपते समय ही पहले से किसी खरीदार से समझौता कर सकेंगे कि उनकी फसल वह खरीदार किस भाव पर खरीदेगा। सरकार का कहना है कि इस बिल में सरकार ने किसानों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रोविजन किया है। यह बिल कृषि पैदावारों की बिक्री, फार्म सर्विसेज, कृषि बिजनेस फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और एक्सपोर्टर्स के साथ किसानों को जुड़ने के लिए मजबूत करता है, क्योंकि व्यापारी के साथ फसल की बिक्री का करार करने के बाद व्यापारी अधिक से अधिक उपज प्राप्त करके लाभ अर्जित करने लिए कांट्रेक्टेड किसानों को गुणवत्ता वाले बीज, तकनीकी मदद, फसल की निगरानी, कर्ज की सहूलत और फसल बीमा की सहूलत मुहैया करायेगा, जिससे उपज में बढ़ोत्तरी होगी।
इस पर आंदोलनरत किसान संगठनों का कहना है कि इससे खेती पर व्यापारियों का कब्जा हो जायेगा और किसान केवल मजदूर बन कर रह जायेगा। कानून में इस बात का कहीं जिक्र नहीं है कि किसान को व्यापारी के साथ अपनी फसल को बेचने के लिए करार करना ही पडेगा। जिन किसानों को व्यापारियों के साथ करार नहीं करना है, तो न करे। मस्त रहे अपनी पारम्परिक खेती में, न अपनाये आधुनिक तकनीक। लो हो गया दूसरा कानून रद्द। अब आंदोलन काहे को

तीसरा कानून है कि कोई जितनी चाहे उतनी कृषि उपज इकट्ठा रख सकता है, कोई सीमा नहीं रहेगी। वैसे तो किसी किसान के लिए यह बात लागू ही नहीं है, व्यापारियों के लिए है।
इस बिल के बार में आंदोलनत कथित किसानों का कहना है कि किसानों के पास फसल को रखने की कोई खास अच्छी व्यवस्था नहीं होती है। इस कारण किसान कम कीमत पर अपनी फसल को बेच कर अधिक दामों में खरीदेगा। कृषकों से जुड़े प्योर व्यापारिक बिल पर जिन किसानों को आपत्ति है, वे अपनी फसल को अपनी हैसियत के अनुसार भंडारण कर ले, न बेचे व्यापारियों को। किसान अपनी फसल व्यापारियों को अनिवार्य रूप से बेचे, इसकी कोई अनिवार्यता बिल में नहीं है। किसान अपनी फसल के भण्डारण की सीमा खुद तय कर ले। हो गया तीसरा कानून रद्द। अब आंदोलन काहे को………।

लेखिका अध्ययनरत  है

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